Gonda Politics: राजनीतिक अवसान की ओर पूर्व बसपा विधायक जलील खां का परिवार!

Sandesh Wahak Digital Desk/A.R.Usmani: बसपा सुप्रीमो मायावती के बहुत ही खास माने जाने वाले गोण्डा सदर के पूर्व विधायक मोहम्मद जलील खां का 14 जून 2018 को दिल का दौरा पडऩे से इंतकाल होने के बाद पार्टी के साथ ही क्षेत्र में मुस्लिम सियासत में आयी रिक्तता की भरपाई आज तक नहीं की जा सकी। विधानसभा से लेकर पंचायत चुनाव तक में पूर्व विधायक के परिवार में आपसी खींचतान जगजाहिर है। इसी का नतीजा रहा कि जलील खां के परिवार के बजाय बसपा ने उनके करीबी रहे हाजी मोहम्मद जकी को विधानसभा का टिकट दिया था।

Mayawati On Caste Census

जलील खां के इंतकाल के बाद मुस्लिम सियासत में आए खालीपन की नहीं हो सकी भरपाई

बसपा सुप्रीमो मायावती के बेहद करीबी रहे मोहम्मद जलील खां ने वर्ष 2002 में अपने राजनीतिक सफर की शुरूआत की थी। उन्होंने सदर विधानसभा का चुनाव लड़ा लेकिन मामूली अंतर से हार गए। इसके बावजूद बसपा सुप्रीमो मायावती ने भरोसा जताते हुए उन्हें दोबारा 2007 में भाग्य आजमाने का मौका दिया। इस चुनाव में जलील खां ने अपने निकटतम प्रतिद्वंदी समाजवादी पार्टी के दिग्गज नेता विनोद कुमार उर्फ पंडित सिंह को हराकर शानदार जीत हासिल की।

हालांकि, 2012 के विधानसभा चुनाव में गुटबाजी का शिकार हुए जलील खान को निर्दलीय चुनाव लडऩा पड़ा। पूर्व विधायक स्वर्गीय मोहम्मद जलील खां की सादगी, मिलनसार स्वभाव और गंगा जमुनी तहजीब के कारण वे सबके प्रिय थे। यही कारण रहा कि गोण्डा सदर विधानसभा क्षेत्र में बसपा का जनाधार तेजी से खिसकता देखकर मायावती ने 2017 के चुनाव में जलील खां को फिर से टिकट देकर मैदान में उतारा।

आपसी खींचतान में उलझा परिवार

हालांकि, मोदी लहर के कारण उन्हें शिकस्त का सामना करना पड़ा। इसके बाद भी वे सपा उम्मीदवार को धकेलकर दूसरे स्थान पर रहे। निश्चित रूप से यह जलील खां की सादगी, ईमानदारी और लोकप्रियता के कारण ही संभव हो सका था। चुनाव हारने के बाद भी जलील खां ने समाज में अपनी जिम्मेदारी नहीं छोड़ी और वे लगातार लोगों के बीच बने रहे। दरअसल, जलील खां और खोरहंसा (चिश्तीपुर) के रहने वाले सपा नेता अफसर हुसैन घसीटू व उनके भाई मौजूदा सपा जिलाध्यक्ष अरशद हुसैन से छत्तीस का आंकड़ा रहता था। वे इस परिवार को कतई पसंद नहीं करते थे।

यही वजह रही कि खोरहंसा समेत आसपास के मुस्लिम बाहुल्य गांवों में 90 फीसदी वोट जलील खां को मिलता था। जब तक जलील खां रहे, तब तक उन्हें खोरहंसा जैसे बड़े गांव में एकमुश्त वोट मिलता था। यहां कभी भी साइकिल रफ्तार नहीं पकड़ सकी, जो समाजवादी पार्टी के इलाकाई अगुआ कहे जाने वाले घसीटू व अरशद हुसैन को हमेशा कचोटती रही। वर्ष 2018 में जलील खां के इंतकाल के बाद सदर विधानसभा में बसपा हाशिए पर चली गयी। जलील खां के परिवार का कोई भी सदस्य विधानसभा चुनाव लडऩे की स्थिति में नहीं रहा। इसकी सबसे बड़ी वजह परिवार की आपसी खींचतान भी रही।

राजनीति विरासत नहीं संभाल पा रहे बेटे

बसपा ने स्वर्गीय जलील खां के करीबी रहे हाजी मोहम्मद जकी को विधानसभा चुनाव में सदर सीट पर मैदान में उतारा, लेकिन वह पांच हजार वोटों में ही सिमट गये। यहां सबसे चौंकाने वाली बात यह रही कि जलील खां के परिवार व गांव का भी पूरा वोट जकी को नहीं मिल पाया था। खोरहंसा जैसे जलील खां के गढ़ में तो बसपा शून्य हो गयी, जो निश्चित रूप से चिंतन, मनन और गहन समीक्षा का विषय था, लेकिन पूर्व विधायक के राजनीतिक वारिस सियासत की कसौटी पर अधकचरे साबित हुए, जिसका खामियाजा उन्हें आज भी भुगतान पड़ रहा है। हकीकत यह है कि जिस गांव के लोग जलील खां को सिर-आंखों पर बिठाते थे, आज वे नजरें चुराते हैं।

इसकी वजह भी साफ है। दरअसल, जिस राजनीतिक परिवार के कारण लोगों ने मोहम्मद जलील खां का दामन थामा था और उन्हें अपनी नुमाइंदगी का मौका दिया था, उनके इंतकाल के बाद परिजनों ने उन्हीं विरोधियों से हाथ मिला लिया।

घसीटू-अरशद के कारण धरी रह गई हज करने की हसरत

इसमें कोई शक नहीं कि पूर्व बसपा विधायक मोहम्मद जलील खां निहायत नेक, ईमानदार इंसान थे। उन्होंने कभी भी गलत की हिमायत नहीं की। सितंबर 2014 में कोतवाली देहात क्षेत्र के चिश्तीपुर गांव में सपा नेता अफसार हुसैन घसीटू व अरशद हुसैन तथा पूर्व विधायक मोहम्मद जलील खां का पक्ष कब्रिस्तान की जमीन पर निर्माण कराने को लेकर आमने-सामने आ गया। देखते ही देखते ईंट-पत्थर आदि से हमला कर दिया गया।
कब्रिस्तान पर निर्माण की गई दीवार को तोड़ कर उसकी ईंटें गोण्डा-फैजाबाद मुख्य मार्ग पर फेंकी जाने लगीं। इसके बाद गोंडा-फैजाबाद मार्ग पर जाम लगा दिया गया। घंटे भर जमकर बवाल हुआ। इसमें कई लोगों को चोटें आईं थीं। पूर्व विधायक मोहम्मद जलील खां समेत कई लोगों पर सपा नेताओं की ओर से खिलाफ गंभीर धाराओं में मुकदमा दर्ज कराया गया, जिसके चलते वह हज करने नहीं जा सके और उनकी हज करने की हसरत धरी रह गयी।

सियासी वजूद खत्म करना हो सकती है मंशा!

पूर्व विधायक जलील खां के परिजनों और उनके राजनीतिक विरोधियों के बीच शुरू हुई गलबहियां इन दिनों सियासी हलकों में चर्चा का विषय बनी हुई है। लोगों द्वारा सवाल खड़े किए जा रहे हैं कि जिस राजनीतिक दुश्मनी को जलील खां अपनी आखिरी सांस तक निभाते रहे, आखिर उन लोगों से समझौते के पीछे क्या मंशा या मजबूरी हो सकती है। पूर्व विधायक के परिवार के एक बेहद करीबी का कहना है कि परिवार को इस मिलन का बहुत बड़ा राजनीतिक नुकसान तय है। उनका कहना है कि सपा नेता मंझे हुए खिलाड़ी हैं। वह पूर्व विधायक के परिजनों से नजदीकियां बढ़ाकर इनके सियासी वजूद को खत्म करना चाहते हैं, क्योंकि यह परिवार उनके राजनीतिक साम्राज्य में रोड़ा रहा।

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