डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्य को इलाहाबाद हाईकोर्ट से बड़ी राहत, फर्जी डिग्री मामले में याचिका खारिज
Sandesh Wahak Digital Desk: उत्तर प्रदेश के डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्य को इलाहाबाद हाईकोर्ट से बड़ी कानूनी राहत मिली है। सोमवार को हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने उनके खिलाफ चल रहे फर्जी शैक्षणिक डिग्री और पेट्रोल पंप आवंटन घोटाले से जुड़े मामले में दायर याचिका को खारिज कर दिया है। अदालत ने स्पष्ट रूप से कहा कि इस प्रकरण में कोई आपराधिक जांच की आवश्यकता नहीं है।
यह फैसला न्यायमूर्ति संजय कुमार सिंह की एकल पीठ ने सुनाया, जिन्होंने पहले 25 मई को इस मामले की सुनवाई पूरी कर फैसला सुरक्षित रख लिया था। माना जा रहा है कि यह निर्णय मौर्य के लिए न सिर्फ कानूनी बल्कि राजनीतिक रूप से भी बड़ी राहत है।
क्या था पूरा मामला?
यह याचिका सामाजिक कार्यकर्ता दिवाकर नाथ त्रिपाठी ने दाखिल की थी। उन्होंने आरोप लगाया था कि केशव प्रसाद मौर्य ने अपने चुनावी हलफनामे में जिस डिग्री को प्रस्तुत किया, वह अमान्य है। इतना ही नहीं, याचिकाकर्ता का दावा था कि इसी डिग्री के आधार पर उन्हें एक पेट्रोल पंप भी आवंटित किया गया था, जो नियमों के विरुद्ध है। उन्होंने अदालत से मांग की थी कि इस पूरे मामले की पुलिस जांच कराई जाए और प्राथमिकी दर्ज की जाए।
मामले का कानूनी सफर
सबसे पहले यह मामला प्रयागराज की निचली अदालत (एसीजेएम) में गया, जहां से याचिका खारिज कर दी गई। इसके बाद त्रिपाठी हाईकोर्ट पहुँचे, लेकिन याचिका वहाँ भी 300 दिन की देरी के चलते खारिज हो गई। फिर उन्होंने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया। सुप्रीम कोर्ट ने जनहित को देखते हुए देरी को दरकिनार करते हुए हाईकोर्ट को निर्देश दिया कि वह याचिका पर गुण-दोष के आधार पर दोबारा विचार करे।
कोर्ट ने क्यों खारिज की याचिका?
हाईकोर्ट में पुनः सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से कोई नया या ठोस सबूत पेश नहीं किया गया जिससे यह साबित हो सके कि मौर्य ने जानबूझकर फर्जी डिग्री का उपयोग किया। कोर्ट ने पाया कि न तो दस्तावेज़ों में कोई ठगी सामने आई है और न ही ऐसा कोई तथ्य, जो मामले को आपराधिक जांच के दायरे में लाता हो। अदालत ने स्पष्ट किया कि सिर्फ शंकाओं और आरोपों के आधार पर किसी नेता की छवि या राजनीतिक जीवन को प्रभावित नहीं किया जा सकता। ऐसे मामलों में ठोस प्रमाण जरूरी होते हैं, जो इस याचिका में अनुपस्थित थे।
राजनीतिक और कानूनी दोनों लिहाज से बड़ी राहत
इस फैसले के बाद केशव प्रसाद मौर्य के लिए यह कहना गलत नहीं होगा कि वे एक गंभीर आरोप से बाहर निकले हैं, जो उनके राजनीतिक करियर को नुकसान पहुँचा सकता था। कोर्ट का यह फैसला उनके लिए एक क्लीन चिट के रूप में देखा जा रहा है।
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