प्रकृति क्यों है कुपित
Sandesh Wahak Digital Desk: मानसूनी बारिश के चलते उत्तर प्रदेश, दिल्ली समेत कई राज्य बाढ़ की चपेट में आ गए हैं। पहाड़ी राज्यों उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश और जम्मू-कश्मीर में न केवल नदियां घर और बाजार को अपने आगोश में ले रही हैं बल्कि पहाड़ भी रोज दरक रहे हैं। अभी तक इन इलाकों में जन-धन की बड़ी हानि हो चुकी है। इसमें सबसे अधिक प्रभावित हिमाचल प्रदेश है। यहां सरकार ने प्रदेश को आपदाग्रस्त घोषित कर दिया है। प्रकृति के इस रौद्र रूप को देखकर लोग डरे हुए हैं।
सवाल यह है कि:-
- साल-दर-साल प्रकृति उग्र रूप क्यों धारण कर रही है?
- क्या यह दुनिया भर में हुए जलवायु परिवर्तन का परिणाम है या स्थानीय गतिविधियां इसके लिए जिम्मेदार हैं?
- क्या विकास की अंधी दौड़ ने पहाड़ों को कमजोर और नदियों के रास्ते बंद कर दिए हैं?
- क्या भूवैज्ञानिकों और विशेषज्ञों की सलाह को नकारने का परिणाम इन राज्यों की आम जनता को भोगना पड़ रहा है?
- क्या प्रकृति केंद्रीय विकास के बिना हालात को सुधारा जा सकेगा?
लगातार हो रही भारी बारिश ने लगभग आधे भारत को जलमग्न कर दिया है। दिल्ली में यमुना खतरे के निशान से काफी ऊपर बह रही हैं। यहां के निचले इलाके पूरी तरह डूब गए हैं। पंजाब के करीब 12 जिले बाढ़ से प्रभावित हैं। यहां से लोग सुरक्षित स्थानों को पलायन कर रहे हैं। उत्तर प्रदेश के कई जिलों में बाढ़ का पानी घुस चुका है। यहां गंगा-यमुना और सरयू उफान मार रही हैं। लाखों एकड़ फसल डूब गयी है। प्रभावित राज्यों की कई बस्तियों में नावें चल रही हैं। जम्मू-कश्मीर में भी हालात खराब हैं। यहां भूस्खलन और बाढ़ से लोगों की परेशानियां बढ़ गयी है। उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश में स्थितियां बदतर हो चुकी हैं। हिमाचल में बाढ़ और पहाड़ों के टूट कर गिरने से अब तक 300 से अधिक लोगों की मौत हो चुकी है। ऐसा क्यों हो रहा है?
नदियों के पाट में हो रहे अवैध अतिक्रमण
दरअसल, राज्य सरकारों ने नदियों के पाट में हो रहे अवैध अतिक्रमण पर ध्यान नहीं दिया। लिहाजा यहां लोग बस्तियां बसा कर रहने लगे। लिहाजा, नदी में बांध या बारिश का पानी आते ही सबसे पहले ये बस्तियां डूबती हैं। दूसरे नदियों को गहरा करने और उसमें सदियों से जमा कंकड़ युक्त कीचड़ की सफाई नहीं की गयी। इससे इसकी पानी की भरण क्षमता कम हो गयी है।
इसके कारण थोड़े से पानी में नदियां तटबंध छोड़ रही हैं। जहां तक पहाड़ी राज्यों का सवाल है तो यहां विकास के नाम पर पहाड़ों और वनक्षेत्र को नुकसान पहुंचाया जा रहा है। इससे यहां मानसून चक्र बिगड़ गया है। पहाड़ के कमजोर होने से भूस्खलन और इनके टूटकर गिरने की प्रक्रिया तेज हो गयी है। इसके अलावा वैश्विक जलवायु परिवर्तन का भी असर मानसून पर पड़ रहा है। साफ है यदि सरकार प्राकृतिक आपदाओं के असर को कम करना चाहती है तो उसे प्रकृति का संरक्षण करते हुए विकास करना होगा अन्यथा और भी भयावह स्थिति का सामना करना पड़ेगा।

