Iran-Israel War पर कांग्रेस में मतभेद, दो बड़े नेताओं ने सरकार के रुख को बताया सही
Sandesh Wahak Digital Desk: ईरान-इजराइल जंग (Iran-Israel War) का असर अब दुनियाभर में महसूस किया जा रहा है और आम लोगों की चिंताएं भी बढ़ने लगी हैं। इस मुद्दे को लेकर भारत की राजनीति में भी हलचल तेज हो गई है। जहां कांग्रेस पार्टी केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार की विदेश नीति पर सवाल उठा रही है, वहीं पार्टी के भीतर ही एकजुटता की कमी साफ दिखाई दे रही है।
सरकार का किया समर्थन
दरअसल कांग्रेस के वरिष्ठ नेता शशि थरूर और मनीष तिवारी ने इस मुद्दे पर पार्टी लाइन से अलग रुख अपनाते हुए सरकार के कदमों को सही बताया है। दोनों नेताओं का मानना है कि मौजूदा हालात में सरकार का सतर्क और संतुलित रवैया देश और जनता के हित में है।
मनीष तिवारी ने स्पष्ट कहा कि ईरान-इजराइल-अमेरिका का यह युद्ध (Iran-Israel War) भारत का नहीं है और देश को अपने हितों को प्राथमिकता देनी चाहिए। उन्होंने कहा कि तेल, गैस, खाद और विदेशों में रह रहे भारतीयों के हितों को ध्यान में रखते हुए ही निर्णय लिए जाने चाहिए, ताकि आम जनता को किसी तरह की परेशानी का सामना न करना पड़े। उनके अनुसार, इस समय सरकार का सावधानी से काम करना सही दिशा में उठाया गया कदम है। उन्होंने यह भी कहा कि रणनीतिक स्वायत्तता का अर्थ यही है कि विरोधाभासी परिस्थितियों के बीच अपने हितों की रक्षा करते हुए संतुलन बनाए रखा जाए।
“चुप्पी कमजोरी नहीं बल्कि समझदारी”
शशि थरूर ने भारत के मौजूदा रुख का समर्थन करते हुए कहा कि हर मुद्दे पर मुखर होना जरूरी नहीं होता। उन्होंने कहा कि भारत की चुप्पी कमजोरी नहीं बल्कि एक सोची-समझी रणनीति है। थरूर के अनुसार, यदि उन्हें किसी भी भारतीय सरकार को सलाह देने का अवसर मिलता, तो वे भी संयम बरतने की ही सलाह देते। उन्होंने कहा कि संयम ही वास्तविक शक्ति है, जो सिद्धांतों और व्यावहारिकता के बीच संतुलन बनाते हुए देश के हितों की रक्षा करने में मदद करता है।
पार्टी के भीतर उठे सवाल
वहीं एक ओर कांग्रेस जहां इस मुद्दे पर सरकार को घेरने की कोशिश कर रही थी, वहीं उसके अपने नेताओं के बयानों ने पार्टी की रणनीति पर सवाल खड़े कर दिए हैं। शशि थरूर और मनीष तिवारी के बयान पार्टी लाइन से अलग माने जा रहे हैं, जिससे आंतरिक मतभेद उजागर हुए हैं। हालांकि यह पहली बार नहीं है जब इन दोनों नेताओं ने पार्टी की आधिकारिक लाइन से अलग राय रखी हो।
राजनीतिक संदेश और आगे की स्थिति
इस पूरे घटनाक्रम ने यह संकेत दिया है कि अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर भारत की राजनीति में भी अलग-अलग दृष्टिकोण मौजूद हैं। जहां एक तरफ विपक्ष सरकार की आलोचना कर रहा है, वहीं उसी विपक्ष के कुछ नेता सरकार के रुख को संतुलित और उचित ठहरा रहे हैं। ऐसे में यह देखना दिलचस्प होगा कि आने वाले समय में इस मुद्दे पर राजनीतिक दलों की रणनीति किस दिशा में आगे बढ़ती है।
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