बालिग अपनी मर्जी की मालिक: इलाहाबाद High Court
Sandesh Wahak Digital Desk: इलाहाबाद हाईकोर्ट ( High Court) ने शाहजहांपुर की बाल कल्याण समिति के एक आदेश को गलत ठहराते हुए लखनऊ के महिला आश्रय गृह में निरुद्ध एक महिला को तत्काल रिहा करने का आदेश दिया है। कोर्ट ने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि बालिग महिला अपनी मर्जी की मालिक होती है और उसे जहां चाहे वहां जाने और अपनी पसंद के व्यक्ति के साथ रहने का पूरा अधिकार है।
कोर्ट की कड़ी टिप्पणी
यह आदेश न्यायमूर्ति सलिल कुमार राय और न्यायमूर्ति जफीर अहमद की खंडपीठ ने महिला की रिहाई के लिए दाखिल बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका पर सुनाया। कोर्ट ने शाहजहांपुर की बाल कल्याण समिति की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठाते हुए कहा कि इस पूरे मामले में उम्र निर्धारण के लिए कोई विधिसम्मत और उचित प्रक्रिया नहीं अपनाई गई। समिति ने केवल स्कूल रिकॉर्ड की फोटो कॉपी पर भरोसा कर महिला को नाबालिग मान लिया, जबकि न तो मूल अभिलेखों की जांच की गई और न ही स्कूल के प्रधानाचार्य से किसी तरह का प्रमाण लिया गया।
उम्र निर्धारण में लापरवाही उजागर
अदालत ( High Court) ने यह भी कहा कि यह तक जांच नहीं की गई कि स्कूल रिकॉर्ड में जन्मतिथि कब, कैसे और किसके निर्देश पर दर्ज की गई। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि याची की ओर से मेडिकल रिपोर्ट के आधार पर महिला की उम्र 19 वर्ष से अधिक बताई गई थी, जबकि स्कूल रिकॉर्ड में उसे नाबालिग दर्शाया गया था। ऐसे विरोधाभास की स्थिति में समुचित और निष्पक्ष जांच की जानी चाहिए थी, जो नहीं की गई।
याची के अधिवक्ता ने कोर्ट को बताया कि महिला अपनी मर्जी से माता-पिता का घर छोड़कर अपने पति के साथ रहना चाहती है और वह आर्य समाज मंदिर, बरेली में विवाह भी कर चुकी है। इसके बावजूद महिला के पिता ने उसे नाबालिग बताते हुए एफआईआर दर्ज करा दी थी। कोर्ट ने पहले ही इस मामले में पति-पत्नी की गिरफ्तारी पर रोक लगा रखी थी।
बालिग होने के अधिकार सर्वोपरि
हाईकोर्ट ( High Court) ने अपने आदेश में दोहराया कि बालिग महिला को अपनी जिंदगी के फैसले खुद लेने का पूरा अधिकार है और उसे किसी भी तरह जबरन आश्रय गृह में रखने का कोई औचित्य नहीं है। इसी आधार पर कोर्ट ने महिला को तुरंत रिहा करने के निर्देश दिए हैं।

