अजमेर दरगाह ब्लास्ट मामला: प्रभावित पीड़ित परिवारों में जगी उम्मीद की किरण

Sandesh Wahak Digital Desk: 11 अक्टूबर 2007 को रमज़ान के पवित्र महीने में, इफ्तार से ठीक पहले, राजस्थान के अजमेर में स्थित सूफी संत हज़रत ख़्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह के प्रांगण में एक बम विस्फोट हुआ। शाम की नमाज़ समाप्त हो चुकी थी और बड़ी संख्या में लोग रोज़ा खोलने के लिए जमा थे। इसी दौरान एक टिफिन कैरियर में रखा गया बम फट गया। इस हमले में तीन लोगों की मौत हो गई और सत्रह लोग घायल हुए।

शुरुआती जांच में इस हमले के लिए पाकिस्तान स्थित आतंकी संगठनों की आशंका जताई गई, लेकिन बाद में जांच की दिशा बदली और मामला राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) से जुड़े कुछ लोगों तक पहुंचा। बाद में यह केस राजस्थान एटीएस से लेकर राष्ट्रीय जांच एजेंसी यानी एनआईए को सौंप दिया गया।

22 मार्च 2017 को जयपुर की एक विशेष एनआईए अदालत ने इस मामले में फैसला सुनाया। अदालत ने देवेंद्र गुप्ता और भावेश भाई पटेल को दोषी ठहराते हुए आजीवन कारावास की सजा सुनाई। अदालत ने यह भी माना कि देवेंद्र गुप्ता साजिश में शामिल था और भावेश पटेल ने दरगाह परिसर में बम रखा था। इस मामले में सुनील जोशी को भी दोषी ठहराया गया था, लेकिन फैसले से पहले ही उनकी रहस्यमय परिस्थितियों में मौत हो चुकी थी।

कई आरोपियों हुए थे बरी

हालांकि, अदालत ने कई अन्य आरोपियों को संदेह का लाभ देते हुए बरी कर दिया, जिनमें स्वामी असीमानंद भी शामिल था। स्वामी असीमानंद पर इससे पहले मक्का मस्जिद ब्लास्ट, 2006 मालेगांव ब्लास्ट और 2007 समझौता एक्सप्रेस ब्लास्ट जैसे मामलों में भी आरोप लग चुके हैं। मुकदमे के दौरान कई गवाहों के हॉस्टाइल हो जाने के कारण अभियोजन पक्ष कमज़ोर पड़ गया।

इन बरी किए गए आरोपियों के खिलाफ शिकायतकर्ता और पीड़ित पक्ष ने अपील दायर की थी। यह अपील डी.बी. क्रिमिनल अपील संख्या 379/2017 के रूप में राजस्थान हाईकोर्ट में लंबित रही, लेकिन करीब पांच वर्षों तक लंबित रहने के बाद वर्ष 2022 में इसे एनआईए अधिनियम की धारा 21(5) का हवाला देते हुए यह कहकर खारिज कर दिया गया कि 90 दिनों से अधिक की देरी माफ नहीं की जा सकती।

इसके बाद एसोसिएशन फॉर प्रोटेक्शन ऑफ सिविल राइट्स (APCR) ने पीड़ित की ओर से सुप्रीम कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया। APCR शिकायतकर्ता सैयद सरवर चिश्ती, जो अजमेर शरीफ दरगाह के खादिम हैं, का प्रतिनिधित्व कर रही है।

सुप्रीम कोर्ट ने किया मामले में हस्तक्षेप

नई दिल्ली में सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में एक अहम हस्तक्षेप करते हुए राजस्थान हाईकोर्ट के आदेश को दरकिनार कर दिया। न्यायमूर्ति एम.एम. सुंदरेश और न्यायमूर्ति सतीश चंद्र शर्मा की खंडपीठ ने डायरी संख्या 51829/2025 में पारित अंतरिम आदेश में कहा कि अपील को केवल तकनीकी आधार पर खारिज नहीं किया जा सकता और हाईकोर्ट को मामले की मेरिट के आधार पर सुनवाई करनी होगी।

APCR की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता अभय महादेव थिप्से तथा अधिवक्ता सौजन्या शंकरण, सिद्धार्थ सतीजा और एम. हुज़ैफा ने सुप्रीम कोर्ट में दलील दी कि देरी माफ न करने की कठोर व्याख्या संविधान के अनुच्छेद 14 और 21 का उल्लंघन है। उन्होंने कहा कि इससे पीड़ितों के अधिकार, न्याय तक पहुंच और अपील के मौलिक अधिकार पर सीधा असर पड़ता है, खासकर ऐसे गंभीर आतंकी मामलों में।

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि प्रक्रियात्मक तकनीकीताओं के कारण न्याय को विफल नहीं किया जा सकता। अदालत ने राजस्थान हाईकोर्ट को निर्देश दिया कि वह अपील को पुनः बहाल कर नए सिरे से मेरिट पर सुने।

अब यह मामला दोबारा राजस्थान हाईकोर्ट में सुना जाएगा। सुप्रीम कोर्ट ने इस प्रकरण में अगली सुनवाई की तारीख 24 मार्च 2026 तय की है। APCR ने इस आदेश का स्वागत करते हुए कहा कि यह फैसला अजमेर दरगाह ब्लास्ट के पीड़ितों के अधिकार और न्याय तक पहुंच के लिए एक महत्वपूर्ण आदेश है।

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