41 साल पुराने सामूहिक दुष्कर्म केस में हाईकोर्ट से 3 आरोपी बरी, 10 साल की हुई थी सजा
Allahabad High Court: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने करीब 41 साल पुराने सामूहिक दुष्कर्म के मामले में तीन आरोपियों को बरी कर दिया है। कोर्ट ने सिराजुल, छोटे लाल और फक्कू को संदेह का लाभ देते हुए दोषमुक्त किया। निचली अदालत ने वर्ष 1985 में तीनों को दोषी ठहराते हुए 10 साल तक के कठोर कारावास की सजा सुनाई थी।
न्यायमूर्ति अब्दुल शाहिद की पीठ ने आरोपियों की अपील पर सुनवाई के बाद यह फैसला दिया। कोर्ट ने कहा कि घटना की प्राथमिकी दर्ज कराने में छह दिन की देरी, पीड़िताओं के बयानों में विरोधाभास, बाद में किए गए बदलाव और भरोसेमंद पुष्टिकारक साक्ष्यों की कमी के कारण अभियोजन पक्ष आरोपों को संदेह से परे साबित नहीं कर सका।
1983 की घटना, 1985 में सुनाई गई थी सजा
मामला उत्तर प्रदेश के फतेहपुर जिले का है। अभियोजन पक्ष के अनुसार, 17 अक्टूबर 1983 की रात करीब 11 से 11:30 बजे दो महिलाएं एक छप्पर के नीचे सो रही थीं। आरोप था कि मोहम्मद अनीस खान, सिराजुल, छोटे लाल और फक्कू समेत छह लोग वहां पहुंचे और दोनों महिलाओं के साथ दुष्कर्म किया।
परिवार के सदस्यों को तमंचा दिखाकर धमकाने का आरोप भी लगाया गया था। घटना की प्राथमिकी 23 अक्टूबर 1983 को दर्ज कराई गई थी।
अपर सत्र न्यायाधीश, फतेहपुर ने 22 अप्रैल 1985 को आरोपियों को भारतीय दंड संहिता की धारा 147 और 376 के तहत दोषी ठहराया था। अदालत ने धारा 147 के तहत एक वर्ष और धारा 376 के तहत 10 वर्ष के कठोर कारावास की सजा सुनाई थी। इस फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती दी गई।
अपील लंबित रहने के दौरान मुख्य आरोपी मोहम्मद अनीस खान की मृत्यु हो गई। इसके बाद उसके खिलाफ कानूनी कार्यवाही समाप्त कर दी गई।
पीड़िताओं के बयानों में विरोधाभास पर कोर्ट ने उठाए सवाल
हाईकोर्ट ने मामले के साक्ष्यों की समीक्षा करते हुए कहा कि दोनों पीड़िताओं के बयानों में घटना के क्रम, आरोपियों के साथ आए लोगों की भूमिका और कपड़े फाड़ने या उतारने से जुड़े विवरणों में अंतर था।
कोर्ट ने यह भी पाया कि शुरुआती शिकायत में राम दुलारे और रंजीत के नाम शामिल नहीं थे। बाद में उनके शामिल होने की बात कही गई। विवेचक ने भी अपने बयान में कहा था कि पहली पीड़िता ने पूछताछ के दौरान इन दोनों के नाम नहीं बताए थे।
चिकित्सकीय परीक्षण में दोनों महिलाओं के शरीर पर कोई ताजा बाहरी या अंदरूनी चोट नहीं मिली थी। हालांकि, हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि चोट या चिकित्सकीय पुष्टि का अभाव अकेले दुष्कर्म के आरोप को खारिज करने का आधार नहीं बन सकता। इस मामले में दूसरे विरोधाभासों और साक्ष्यों की कमी के साथ इन तथ्यों ने अभियोजन के मामले पर संदेह बढ़ाया।
विश्वसनीय गवाही से अकेले भी हो सकती है दोषसिद्धि
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में यह भी स्पष्ट किया कि यदि पीड़िता की गवाही भरोसेमंद हो, तो केवल उसी के आधार पर भी दोषसिद्धि की जा सकती है। हर मामले में अतिरिक्त पुष्टिकारक साक्ष्य होना जरूरी नहीं है।
लेकिन इस मामले में पीड़िताओं के बयानों की विश्वसनीयता पर गंभीर सवाल थे। कोर्ट ने माना कि अभियोजन पक्ष आरोपियों का अपराध संदेह से परे साबित करने में विफल रहा। इसी आधार पर हाईकोर्ट ने सत्र अदालत के फैसले को निरस्त कर दिया और सिराजुल, छोटे लाल तथा फक्कू को बरी कर दिया।
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