Ansal API: नेता, अफसर और जांच एजेसियां अंसल एपीआई के हाथों का खिलौना

वर्षों तक लुटते रहे निवेशक, बसपा-सपा राज के दौरान बिल्डर को नियम विपरीत पहुंचाया गया सैकड़ों करोड़ का लाभ

Sandesh Wahak Digital Desk: प्रभावशाली व्यक्ति को बड़े पैमाने पर अतिक्रमण करने देने में नौकरशाह शामिल होंगे, ये तल्ख टिप्पणी इलाहाबाद हाईकोर्ट की है। जिसने दो साल पहले सिंचाई की हजार करोड़ की जमीन के घोटाले पर अंसल के खिलाफ सीबीआई जांच के आदेश दिए थे।

सुल्तानपुर रोड स्थित सुशांत गोल्फ सिटी बसाने के नाम पर बिल्डर अंसल एपीआई अफसरों और नेताओं से साठगांठ करके यूपी में रियल एस्टेट का सबसे बड़ा घोटाला अंजाम दे चुका है। जिसका खामियाजा अरबों की गाढ़ी कमाई फंसाने वाले हजारों निवेशकों को अब भुगतना पड़ रहा है।

एलडीए से लेकर प्रशासन के अफसरों की नींद नहीं टूटी

यूपी में सरकारें बदलती रहीं, लेकिन अंसल के घोटाले नहीं रुके। सैकड़ों एफआईआर से लेकर सीबीआई-ईडी की जांच भी अंसल के मालिकों पर शिकंजा कसने में नाकाम रहीं। अंसल सैकड़ों करोड़ की सरकारी जमीनों पर कब्जा करता रहा, एलडीए से लेकर प्रशासन के अफसरों की नींद नहीं टूटी। सरकारी तंत्र को खरीद कर अंसल ग्रुप ने तमाम जांचों और करोड़ों के जुर्माने से बचने के लिए एनसीएलटी से दिवालिया घोषित कराकर खुद को सेफ जोन में पहुंचा दिया है।

Mayawati

अंसल के मददगार उन अफसरों-नेताओं पर एजेंसियों को शिकंजा कसना चाहिए, जिनको टाउनशिप में लग्जरी विला कौडिय़ों के भाव देकर उपकृत किया गया है। अंसल को 22 साल पहले हाईटेक टाउनशिप नीति के तहत करीब 1350 एकड़ में टाउनशिप का लाइसेंस एलडीए से मिला था। नियम विपरीत बाद में मायावती सरकार के दौरान अंसल को साढ़े तीन हजार एकड़ का लाइसेंस दिया गया। सपा सरकार भी कदमों में बिछी रही। साढ़े छह हजार एकड़ जमीन देकर टाउनशिप का दायरा बढ़ा दिया गया।

एलडीए के पूर्व वीसी बीबी सिंह (लाल घेरे में)

भूमाफिया की तर्ज पर सैकड़ों करोड़ की जमीनें हजम कर ली

एलडीए के पूर्व वीसी बीबी सिंह, पीएन मिश्रा के साथ ही रमेश यादव जैसे तमाम आईएएस को लाखों रूपए प्रतिमाह पर अंसल ने नौकरी पर रखकर सरकारी तंत्र को खरीदने की जिम्मेदारी सौंपी। योगी सरकार ने भले टाउनशिप का दायरा घटाकर साढ़े चार हजार एकड़ कर दिया। लेकिन इस दौर तक टाउनशिप में भूमाफिया की तर्ज पर सैकड़ों करोड़ की जमीनें हजम कर ली गई। नियामक रेरा भी सिर्फ आरसी जारी करने में व्यस्त रहा। 2018 में ही सरकारी तंत्र से अंसल के 91 प्रोजेक्ट की जांच के आदेश हुए थे। रिटायर हो चुके इंजीनियरों-अफसरों के पास अंसल की टाउनशिप में आशियाने हैं।

घोटालों के नियमितिकरण के लिए दागी नौकरशाहों की होती है तैनाती

सरकार और अफसर अंसल के हाथों का खिलौना हैं। इसका प्रमाण 11 साल पहले ही मिल गया था। जब अंसल की मनमानी न मानने पर तत्कालीन प्रमुख सचिव आवास प्रवीर कुमार को हटा दिया गया था। इसके बाद प्रमुख सचिव के पद पर दागी सदाकांत को बिठाया गया। यही नहीं तत्कालीन एलडीए वीसी राजीव अग्रवाल ने बोर्ड बैठक के सहारे अंसल के भूउपयोग घोटालों का नियमितीकरण करने का खाका खींचा था।

तत्कालीन मंडलायुक्त संजीव दुबे ने एलडीए की बोर्ड बैठक से हाथ खींचें तो उन्हें भी हटा दिया गया। इसके बाद मंडलायुक्त के पद पर देवेश चतुर्वेदी (मौजूदा सचिव कृषि भारत सरकार) की तैनाती हुई। लेकिन इस ईमानदार अफसर ने ज्वाइन करने से ही इंकार कर दिया। इसके बाद आये कुमार कमलेश ने भी कई बार बोर्ड बैठक टाली। लेकिन हटा दिए गए। इसके बाद संजीव सरन को मंडलायुक्त बनाकर खेल किया गया।

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