Balrampur News: 1.65 करोड़ की परियोजना में भ्रष्टाचार का आरोप, ग्रामीण बोले- हल्की बाढ़ भी नहीं झेल सकी

Sandesh Wahak Digital Desk: उत्तर प्रदेश का बलरामपुर जिला हर साल राप्ती नदी के कहर की भरपाई अपने ही किसानों की ज़मीन को खोकर करता है। बलरामपुर के हजारों किसान ऐसे हैं, जो सरकारी तंत्र की नाकामी की वजह से हर साल अपनी खेती किसानी खोते हैं, अपना घर बार खोते हैं। ऐसा नहीं है कि सरकार के स्तर से प्रयास नहीं किया जाता।

लेकिन सरकार के स्तर से किया जाने वाला प्रयास हर बार उदासीनता और लूट की भेंट चढ़ जाता है। हर बार जारी होने वाले बजट में अधिकारी, नेता और ठेकेदार मिलकर जमकर बंदरबांट करते हैं। बाढ़ खंड के द्वारा करवाए जा रहे कार्यों की ज़मीनी पड़ताल करने के लिए हम सदर तहसील के गांव चौकाकलां मधवापुर पहुंचे। जहां पर स्थित सामान्य नज़र आई लेकिन ग्रामीणों का कहना था कि इस बार राप्ती नदी में ना तो बाढ़ आई ना ही कोई भीषण कटान की स्थिति पैदा हुई। उसके बाद भी कई परक्यूपाइन और जियो बैग, जियो ट्यूब इस दौरान बह गए। पढ़िए, योगेंद्र त्रिपाठी की ग्राउंड रिपोर्ट…

बाढ़ खंड परियोजना या बजट खपाने का खेल

बलरामपुर जिले के सिंचाई विभाग का बाढ़ खंड हर साल लाखों करोड़ों के बजट का वारा न्यारा करता है। लेकिन, ज़मीन पर कटान रोधी कार्यों का स्तर इतना खराब और मानक विहीन होता है कि राप्ती के घटते बढ़ते जल स्तर में सब कुछ समाहित हो जाता है। उसके बाद बजट खारिज़ हो जाता है। किसानों और ग्रामीणों के हाथ लगती है तो बस नाउम्मीदी और लाचारी। ऐसे में बाढ़ खंड के कार्यों पर यही कहा जा सकता है कि हर बाढ़ ‘बाढ़ खंड’ के अधिकारियों व नेताओं के लिए आपदा में अवसर पैदा करती है।

नदी के मुहाने पर बसे गांवों के लिए संकट

बलरामपुर जिला, भारत नेपाल की सीमा पर स्थित है। भारत नेपाल सीमा पर स्थित शिवालिक पर्वत श्रृंखला से डेढ़ दर्जन छोटे और बड़े नाले निकलते हैं। इसके साथ ही राप्ती नदी और बूढ़ी राप्ती नदी अपना-अपना कहर हर बरसात के मौसम में भारी मात्रा में पानी लेकर आती हैं।  इस दौरान बाढ़ जब जाता है तो उसके बाद क्या नदियां क्या नाले सब बड़े पैमाने पर कटान करते हैं। इनके द्वारा होने वाली कटान से बचाव के लिए जल शक्ति मंत्रालय के तहत आने वाले सिंचाई विभाग का एक खंड बलरामपुर में स्थापित है।

यह जिले भर के नदी और नालों से संबंधित डेटा को जुटाते हुए प्रस्ताव शासन को भेजता है और शासन के द्वारा उन प्रस्तावों पर मुहर लगाते हुए कटान रोधी कार्य करवाए जाते हैं। इसके साथ ही बाढ़ खंड के पास अनुरक्षण कार्यों के संपादन के लिए प्रतिवर्ष लाखों में एक इमरजेंसी फण्ड भी होता है। सारा खेल इसी के दौरान किया जाता है।  कहीं पर मानक विहीन कार्य तो कहीं बाढ़ और कटान में करवाए गए कार्यों के बह जाने का बहाना होता है। ठेकेदार से लेकर बड़े अधिकारी तक सब इस बहती गंगा में केवल अपना हाथ ही नहीं धुलते बल्कि वह नहाते भी हैं। और ग्रामीण व किसान कटान के कारण दिन-ब-दिन हलकान होते रहते हैं।

क्या कहते हैं चौकाकलां मधवापुर के ग्रामीण?

चौकाकलां मधवापुर राप्ती नदी के बांए तट बसा हुआ एक बड़ा गांव है। लोग बताते हैं कि राप्ती नदी पहले गांव से तकरीबन 500 मीटर दूर बहा करती थी। लेकिन कटान करते करते यह अब गांव के लगभग बगल में बहने लगी हैं। ग्रामीण बताते हैं कि हमें राप्ती के कहर से बचाने के लिए अप्रैल के महीने में एक करोड़ 65 लाख 35 हजार रुपए से एक परियोजना की शुरुआत की गई। जो 550 मीटर लंबी परियोजना है।

बृजमोहन और धर्मराज (ग्रामीण)

ग्रामीणों का कहना है कि 250 मीटर में डैमपर बिछाने व परक्यू पाइन लगाने का काम शुरू हुआ। दो चरणों में इस परियोजना को पूरा किया जाना था, जिसमें इस चरण में 9 मदद जियो बैग डैमपनर (बड़े साइज का मज़बूत बैग, जिसमें बालू भरकर नदी के किनारे कटान रोकने के लिए लगाया जाता है।) व इसी तरह पूरे 250 मीटर दायरे में परक्युपाइन लगाने के काम की शुरूआत की गई। यह काम मेसर्स सिंह ट्रेडर्स के नाम पर आवंटित है, जिसके ठेकेदार/ मालिक अजय कुमार सिंह हैं। इनके फर्म के द्वारा यहां पर काम करवाया जा रहा है।

चंदरीकेश यादव, ग्रामीण

ग्रामीण चंद्ररीकेश यादव बताते हैं कि काम तो समय शुरू हुआ, हम लोगों को उम्मीद थी कि इस कार्य के पूरा हो जाने के बाद हमारा गांव राप्ती की तबाही से बच जाएगा। काम तो हुआ, लेकिन काम उतना अच्छा नहीं हुआ, जिस क़्वालिटी का होना चाहिए था। बीच में काम रुक भी गया। एक आध महीने काम बंद रहा। ठेकेदार यहां काम करने के लिए तैयार ही नहीं था। फिर किसी तरह अधिकारियों का दबाव बना तो उन्होंने काम शुरू करवाया तब तक बारिश आ गयी। फिर काम तब से चल रहा है। उन्होंने बताया कि हम ग्रामीण परेशान हैं लेकिन यहां हर काम में देरी और कोताही की जा रही है।

ना बनते देर, न बिगड़ते देर

ग्रामीण बताते हैं कि जब परियोजना की शुरुआत हुई तो सब ठीक था, लेकिन कुछ दिन बाद बारिश होने लगी, बारिश के बाद आई बाढ़ और कटान से कई सौ सीमेंट के मिट्टी भरे बोरे व दो जियो बैग डैमपनर बह गए। इसके बाद भी काम चल रहा है। लेकिन हम लोग काम से संतुष्ट नहीं है। काम में ना केवल भ्रष्टाचार का बोल बाला है। बल्कि अगर काम को सही ढंग से नहीं किया गया तो गांव के कई लोगों का खेत समेत स्कूल और पंचायत भवन आने वाले समय में कट सकता है। ग्रामीण बताते हैं कि इस बार बाढ़ नहीं आई क्योंकि बरसात ही कम हुई है। लेकिन हर बार प्रकृति इसी तरह साथ नहीं देगी। इस बार जब भी बाढ़ आएगी तब हमारे खेत और गांव में हुआ सरकारी निर्माण कटान से बह सकता है।

ग्रामीण बताते है कि अगर सरकार की उच्च स्तरीय कमेटी द्वारा बाढ़ खंड के कार्यों की जांच हो जाए और जांच तथ्यों के आधार पर कोई कार्रवाई कर दी जाए तो इनमें कुछ सुधार आ सकता है। यह लोग परियोजनाओं में जमकर भ्रष्टाचार करते हैं। कभी भी इनकी परियोजनाएं जमीन पर नहीं टिकती हैं। कभी हल्की सी बाढ़ में कटान का शिकार हो जाती हैं तो कभी ज़्यादा बाढ़ में। लेकिन अतं में परेशान जनता ही होती है।

जेई के अनुसार काम पूरा, ग्रामीणों के काम अधूरा

ग्रामीणों के अनुसार, अभी यहां चल रही परियोजना अधूरी है। ग्रामीणों का कहना है इसी बार आई हल्की बाढ़ के कारण दो जियो बैग डैमपनर कटान में बह भी गए है। इस मामले पर हमने इस कार्य को देख रहे अवर अभियंता अतुल कुमार मौर्य से बात की तो उन्होंने कहा कि कार्य अब पूरी तरह से कंप्लीट है। बाकी की डिटेल्स बताने के लिए मैं अधिकृत नहीं हूं। आप एसडीओ से बात कर लें। जब हमने इस बाबत एसडीओ अंकित वर्मा को फ़ोन मिलाया तो उन्होंने कॉल नहीं उठाया। इसलिए बाढ़ खंड का पक्ष शामिल नहीं किया जा सका है।

तो क्या निरीक्षण के बाद होगा एक्शन?

अब देखना होगी कि ग्रामीणों का आरोप है कि परियोजना में भ्रष्टाचार हुआ है। परियोजना को पूरा करने में लेटलतीफी हुई है। परियोजना अगर समय से पूरी होती तो हमारे खेत और गांव बच जाते लेकिन ऐसा हुआ नहीं। अब देखना होगा कि जिले के बड़े अधिकारी किस तरह का एक्शन लेते हैं। फिर कुछ दिन पहले ही जिले की नवागत अपर जिलाधिकारी ज्योति राय ने चौकाकलां का निरीक्षण किया था। ग्रामीणों ने इस दौरान उनसे भी शिकायत की थी।

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