Balrampur News: बदहाल स्वास्थ्य व्यवस्था की पोल खुली, CHC प्रभारी बोले- हमारे यहां ऑन कॉल होती है इमरजेंसी सेवाएं

Sandesh Wahak Digital Desk: ​बलरामपुर जिले में स्वास्थ्य सेवाओं का हाल सुधरने के बजाय दिन-प्रतिदिन बद से बदतर होता जा रहा है। जिला प्रशासन और स्वास्थ्य विभाग के दावों के उलट, ज़मीनी हकीकत कुछ और ही है। हमने सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों पर सरकार के मानक के अनुसार मिलने वाली सुविधाओं का एक रिएलिटी चेक किया, जिसमें सामने आया है कि सीएचसीऔर पीएचसी में आपातकालीन सेवाएं लगभग ठप हैं, जिससे मरीजों को मजबूरन निजी अस्पतालों में महंगा इलाज कराना पड़ रहा है। समय पर इलाज ना मिलने के कारण कहीं असमय मृत्यु देखने को मिलती है तो कहीं मरीजों को गंभीर बीमारी और हालातों का सामना करना पड़ता है।

​शिवपुरा सीएचसी की हतप्रभ करने वाली स्थिति

​ताजा मामला बलरामपुर के सुदूर स्थित शिवपुरा सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र (सीएचसी) का है। यहाँ स्वास्थ्य सेवाओं की हालत बेहद खराब है। हमारी टीम ने रात करीब 7 बजे इस अस्पताल का रियलिटी चेक किया, जहाँ की स्थिति बेहद चौंकाने वाली थी। इमरजेंसी वार्ड पूरी तरह खाली था और मरीजों की देखभाल के लिए कोई डॉक्टर मौजूद नहीं था। बल्कि, एक युवा लड़का अस्पताल का काम संभालता मिला, जो अस्पताल में बी फार्मा अप्रेंटिस था। आधे घंटे तक इंतजार करने के बाद भी कोई चिकित्सक नहीं पहुंचा। बाद में फोन करने पर अधीक्षक रजत शुक्ला मौके पर आए और मामले पर लीपापोती करने की कोशिश करते रहे।

पूरे अस्पताल में ​गंदगी और अव्यवस्था का बोलबाला

​अस्पताल में रात 8 बजे ने केवल मुख्य मार्ग पर अंधेरा था। बल्कि पूरे परिसर में चारों ओर साफ-सफाई का भी बुरा हाल था। जनरल वार्ड में गंदगी का अंबार लगा था, बिस्तर गंदे थे, और तकिए-चादर गायब थे। मरीजों और उनके परिजनों को इसी गंदी जगह पर लेटने और इलाज करवाने के लिए मजबूर होना पड़ रहा था।

​स्थानीय लोगों का आरोप है कि अस्पताल में न तो जरूरी दवाएं उपलब्ध हैं और न ही जांचें ठीक से हो रही हैं। डॉक्टर अक्सर मरीजों को बाहर से महंगी दवाएं और जांच कराने के लिए कह देते हैं, जिससे गरीब और मध्यम वर्ग के परिवारों पर आर्थिक बोझ बढ़ जाता है। बताया जाता है कि यहां पर जनरेटर और बिजली के आभाव में गर्भवती महिलाओं व अन्य मरीजों को एक्स रे व अल्ट्रासाउंड होने में भी समस्याओं का सामना करना पड़ता है।

अधिकारियों की ​जवाबदेही पर सवाल

हम अस्पताल में तकरीबन आधे घंटे रहे। अस्पताल के आपातकालीन सेवाओं को देखने वाला कोई डॉक्टर नहीं था। कुछ देर बाद डॉ शहज़ाद आलम वहां पहुंचे और झल्लाते हुए हमारी टीम को देखकर वहां से चले गए। इसके बाद जब अधीक्षक रजत शुक्ला पहुंचे तो हमने उनसे बात करने की कोशिश की। हमने जब इन मुद्दों पर सवाल किया गया, तो उन्होंने गोलमोल जवाब दिए। गंदगी के सवाल पर उन्होंने सुधार का आश्वासन दिया, जबकि इमरजेंसी सेवाओं पर कहा कि हमारे यहां कोई स्पेशल इमरजेंसी रूम या वार्ड नहीं है। जब कोई इस तरह का मरीज आता है तो फोन करने पर डॉक्टर पहुंच जाते हैं। एमओआईसी रजत शुक्ला की इस प्रतिक्रिया स्वास्थ्य व्यवस्था पर गंभीर सवाल उठते है; क्या आपातकालीन सेवाएं फोन पर दी जा सकती हैं, या ये मरीजों की जान बचाने के लिए चौबीसों घंटे चालू रहनी चाहिए?

स्थानीय निवासियों का गंभीर आरोप

इस मामले पर ​स्थानीय निवासियों का कहना है कि यह अस्पताल केवल नाम के लिए चल रहा है। आपात स्थिति में लोग यहाँ भरोसा नहीं कर सकते, और उन्हें मजबूरन निजी अस्पतालों में जाना पड़ता है। लोगों ने मांग की है कि लापरवाह डॉक्टरों और कर्मचारियों पर कड़ी कार्रवाई की जाए और अस्पताल की व्यवस्था को सुधारने के लिए उच्चस्तरीय जांच की जाए।

सीएमओ क्या करेंगे कार्रवाई?

एक तरफ जहां इस घटना ने बलरामपुर के स्वास्थ्य विभाग की कार्यशैली पर एक बड़ा प्रश्नचिह्न खड़ा किया है, वहीं दूसरी तरफ सवाल उठता है कि जब तक जिम्मेदार अधिकारियों और डॉक्टरों पर ठोस कार्रवाई नहीं होगी, तब तक आमजन को बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं मिलना मुश्किल है। अब देखना होगा खबर के बाद सीएमओ डॉ मुकेश रस्तोगी इन लापरवाह डॉक्टरों व कर्मचारियों पर क्या कार्रवाई करते हैं। ख़ैर, हमने जब इस मामले में सीएमओ का पक्ष लेने के लिए सरकारी नंबर कॉल किया तो फ़ोन बंद बता रहा था।

रिपोर्ट: योगेंद्र त्रिपाठी

 

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