‘खाकी’ का गजब खेल! रेप पीड़िता और पिता को ही थमा दिया पॉलीग्राफ टेस्ट का नोटिस, HC ने लगाई क्लास
रेप विक्टिम के पॉलीग्राफ टेस्ट पर हाईकोर्ट ने प्रमुख सचिव गृह को किया तलब
Sandesh Wahak Digital Desk: उत्तर प्रदेश पुलिस अपनी कार्यशैली को लेकर अक्सर सुर्खियों में रहती है, लेकिन बलरामपुर जिले से जो मामला सामने आया है, वह न केवल हैरान करने वाला है बल्कि पुलिस की संवेदनशीलता पर गंभीर सवाल खड़े करता है। यहां पुलिस ने रेप के आरोपी पर शिकंजा कसने के बजाय, नाबालिग पीड़िता और एफआईआर दर्ज कराने वाले उसके पिता को ही पॉलीग्राफ टेस्ट (झूठ पकड़ने वाली मशीन) का नोटिस थमा दिया। इस मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने बलरामपुर पुलिस और एसपी को जमकर फटकार लगाई है। कोर्ट ने एसपी के हलफनामे को झूठा करार देते हुए चौंकाने वाला बताया है। साथ ही प्रमुख सचिव (गृह) को तलब किया है।
एसपी के हलफनामे को कोर्ट ने बताया ‘झूठा’
बलरामपुर जिले में पुलिस का एक ऐसा कारनामा सामने आया है, जिसे सुनकर हाईकोर्ट भी सन्न रह गया। यहां पुलिस ने अपहरण और दुष्कर्म के एक मामले में आरोपी के खिलाफ सबूत जुटाने के बजाय, उल्टे नाबालिग पीड़िता और उसके पिता (शिकायतकर्ता) को ही पॉलीग्राफ टेस्ट कराने का नोटिस भेज दिया। जब नाबालिग़ पीड़िता का पिता पॉस्को कोर्ट में गया तो कोर्ट ने पुलिस की इस कार्यवाही पर सवाल उठाते हुए, पॉलीग्राफ टेस्ट से मना कर दिया था। फिर सरकार के द्वारा यह मुकदमा हाईकोर्ट में चैलेंज किया गया।

जब हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच इस मामले की सुनवाई शुरू की तो इस मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए पुलिस अधीक्षक बलरामपुर से व्यक्तिगत हलफनामा दाखिल करने को कहा। जब एसपी बलरामपुर विकास कुमार ने हाईकोर्ट में अपना एफिडेविट दाखिल किया तो उसमें कई तथ्य छिपा लिए। साथ ही तमाम तथ्यों को झूठा पेश किया। इस कृत्य को हाईकोर्ट की डबल बेंच ने बेहद असंवेदनशील मानते हुए बलरामपुर के पुलिस अधीक्षक (एसपी) के हलफनामे को ‘झूठा’ व ‘चौकाने’ वाला करार दिया है।

एसपी ने कोर्ट में बोला झूठ, छिपाया अहम तथ्य
न्यायमूर्ति अब्दुल मोईन और न्यायमूर्ति बबीता रानी की खंडपीठ ने इस मामले पर सख्त रुख अपनाया है। कोर्ट ने पाया कि एसपी बलरामपुर विकास कुमार ने अपने हलफनामे में जानकारी दी थी कि पॉलीग्राफ टेस्ट का नोटिस भेजा गया है, लेकिन उन्होंने कोर्ट से एक बड़ा सच छिपा लिया। सच यह था कि पॉलीग्राफ टेस्ट कराने की पुलिस की अर्जी को स्थानीय अदालत ने 1 दिसंबर को ही खारिज कर दिया था। इसके बावजूद, एसपी ने अपने शपथ पत्र में कहा कि अर्जी अभी विचाराधीन है। कोर्ट ने इसे चौंकाने वाला बताते हुए प्रमुख सचिव (गृह) को व्यक्तिगत हलफनामा दाखिल करने या अगली सुनवाई (15 दिसंबर) पर हाजिर होने का आदेश दिया है।
क्या है पूरा मामला?
याची के वकील ने कोर्ट को बताया कि 22 अक्टूबर 2024 को एफआईआर दर्ज कराई गई थी। पीड़िता की ओर से स्थानीय पॉक्सो कोर्ट में अर्जी देकर कहा गया कि 28 अक्टूबर 2024 को उसने जो बयान दिया था, वह आरोपी और पुलिस के दबाव में दिया गया था। इसके बाद पॉक्सो कोर्ट ने 8 जनवरी 2025 को दोबारा बयान दर्ज करने का आदेश दिया, जिसके अनुपालन में 19 मार्च को बयान दर्ज भी हो गया। हैरानी की बात यह है कि राज्य सरकार ने पीड़िता के पक्ष में आए 8 जनवरी के आदेश को ही हाईकोर्ट में चुनौती दे दी।
हाईकोर्ट ने पूछा- राज्य सरकार को क्या परेशानी है?
हाईकोर्ट ने पुलिस और सरकार के रवैये पर आश्चर्य जताया। कोर्ट ने कहा कि जिस आदेश को आरोपी चुनौती दे सकता था, उसके खिलाफ राज्य सरकार आखिर क्यों याचिका दाखिल कर रही है? कोर्ट ने साफ कहा कि पुलिस का यह रवैया पीड़िता के प्रति असंवेदनशील है। अब इस मामले की अगली सुनवाई 15 दिसंबर को होगी, जिसमें सरकार को जवाब देना होगा और प्रमुख सचिव गृह को व्यक्तिगत रूप से कोर्ट में उपस्थित होना होगा।
रिपोर्ट : योगेंद्र त्रिपाठी
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