बांके बिहारी मंदिर विवाद: सरकार के अध्यादेश के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट पहुंचा मंदिर प्रबंधन, अब 30 जुलाई को होगी सुनवाई

Sandesh Wahak Digital Desk: मथुरा के विश्वप्रसिद्ध बांके बिहारी मंदिर को लेकर एक बड़ा मामला सुप्रीम कोर्ट की चौखट पर पहुंच गया है। मंदिर प्रबंधन समिति ने यूपी सरकार के उस अध्यादेश को चुनौती दी है, जिसके तहत मंदिर प्रशासन को एक सरकारी ट्रस्ट के हवाले करने की बात कही गई थी। सुप्रीम कोर्ट ने इस याचिका को स्वीकार करते हुए 30 जुलाई को सुनवाई तय की है।

क्या है मामला?

दरअसल, यूपी सरकार ने हाल ही में “श्री बांके बिहारी जी मंदिर न्यास अध्यादेश 2025” जारी किया था। इसके तहत मंदिर के प्रबंधन और श्रद्धालुओं की सुविधा का जिम्मा एक 11 सदस्यीय ट्रस्ट को सौंपने का प्रस्ताव है। सरकार का कहना है कि इससे मंदिर की व्यवस्था बेहतर होगी और दर्शनार्थियों को सुविधा मिलेगी।

लेकिन मंदिर प्रबंधन समिति और श्रद्धालु इससे असहमत हैं। उनका तर्क है कि यह एक निजी मंदिर है और राज्य सरकार का इसमें हस्तक्षेप धार्मिक स्वतंत्रता का हनन है। यही वजह है कि प्रबंधन समिति ने इस अध्यादेश को असंवैधानिक बताते हुए सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है।

सुप्रीम कोर्ट में क्या हुआ?

सुनवाई के दौरान जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की खंडपीठ ने सरकार से कई सवाल पूछे। कोर्ट ने पूछा कि देश में कितने मंदिरों का प्रबंधन सरकार ने कानून बनाकर अपने अधीन किया है? साथ ही यह भी कहा कि इस मुद्दे पर व्यापक जानकारी दी जाए, ताकि तय किया जा सके कि यह व्यवस्था उचित है या नहीं।

मंदिर समिति की ओर से वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने पक्ष रखा। उन्होंने कोर्ट को बताया कि बांके बिहारी मंदिर का इतिहास गवाह है कि यह एक स्वतंत्र धार्मिक संस्था है, और सरकार इसे जबरन अपने नियंत्रण में लेने की कोशिश कर रही है। उन्होंने यह भी कहा कि मंदिर के पास लगभग 400 करोड़ रुपये की संपत्ति है, जिस पर सरकार की नजर है, जबकि किसी भी तरह की अनियमितता का कोई आरोप भी नहीं है।

कोर्ट ने पूछा हाईकोर्ट क्यों नहीं गए?

सुनवाई के दौरान पीठ ने यह सवाल भी उठाया कि मंदिर समिति इस मामले को सीधे सुप्रीम कोर्ट क्यों लाई, जबकि इलाहाबाद हाईकोर्ट भी इसका समाधान कर सकता था? इस पर सिब्बल ने बताया कि मामला अत्यंत गंभीर है और इससे देशभर के धार्मिक स्थलों की स्वतंत्रता प्रभावित हो सकती है।

मंदिर भक्त देवेंद्र गोस्वामी ने कोर्ट के एक पुराने आदेश को भी चुनौती दी है, जिसमें सरकार को मंदिर के 300 करोड़ रुपये के कोष का इस्तेमाल कॉरिडोर परियोजना के लिए करने की अनुमति दी गई थी। उनका कहना है कि यह फैसला मंदिर प्रबंधन को सुने बिना लिया गया था।

सरकार का पक्ष

यूपी सरकार का कहना है कि उनका उद्देश्य सिर्फ मंदिर की व्यवस्था सुधारना और श्रद्धालुओं को बेहतर सुविधा देना है। अध्यादेश के तहत 11 सदस्यों का ट्रस्ट बनेगा, जिसमें सरकारी और गैर-सरकारी दोनों ही सदस्य होंगे — सभी सनातन धर्म के अनुयायी। सुप्रीम कोर्ट में इस मामले की अगली सुनवाई अब 30 जुलाई 2025 को होगी। मंदिर समिति चाहती है कि सरकार अध्यादेश को वापस ले और मंदिर की धार्मिक स्वतंत्रता को बहाल रखा जाए। वहीं, सरकार का रुख अब अगली सुनवाई में स्पष्ट होगा।

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