ज़मीन घोटाले का बड़ा खुलासा, अफसरों और रिश्तेदारों को फर्जी तरीके से बांटे गए प्लॉट, हाईकोर्ट ने मांगा जवाब
Sandesh Wahak Digital Desk: लखनऊ में ज़मीन घोटाले का मामला अब फाइलों की धूल झाड़कर अदालत की चौखट तक पहुंच गया है। गोमती नगर विस्तार योजना में करीब 3.59 लाख वर्गफुट ज़मीन को फर्जी सदस्यता के आधार पर अफसरों और उनके रिश्तेदारों में बांट दिया गया। अब इस मामले में लखनऊ हाईकोर्ट ने राज्य सरकार से जवाब तलब किया है।
हाईकोर्ट की सख्ती, दबे मामले को बाहर निकाला
हाईकोर्ट ने 23 अप्रैल 2025 को सरकार के वकील से पूछा कि इस मामले में अब तक क्या कार्रवाई हुई है। इसके बाद प्रमुख सचिव आवास पी. गुरुप्रसाद ने संबंधित दस्तावेजों की जांच शुरू कर दी है। कोर्ट ने यह जानकारी मांगी है कि एक साल से दबी पड़ी रिपोर्ट पर अब तक क्या कदम उठाए गए।
4 साल की जांच में खुला फर्जीवाड़ा
2020 से 2024 तक चली जांच में दो हाउसिंग सोसाइटियों– हिमालयन सहकारी आवास समिति और बहुजन निर्बल वर्ग सहकारी समिति के जरिए हुए ज़मीन घोटाले का पर्दाफाश हुआ। इन समितियों ने एलडीए अधिकारियों से साठगांठ कर फर्जी सदस्य बनवाए और फिर उन्हें कीमती ज़मीनें बांट दीं।
हिमालयन समिति के पूर्व उपाध्यक्ष तारा सिंह विष्ट ने आरोप लगाया कि एलडीए के पूर्व वीसी बीबी सिंह की पत्नी तक को अवैध रूप से प्लॉट आवंटित किया गया। लिस्ट में पूर्व चीफ इंजीनियर, ज़ोनल अफसर और न्यायिक अधिकारियों के नाम भी शामिल हैं।

90 से ज्यादा प्लॉट होंगे रद्द
सहकारिता विभाग के सहायक आयुक्त एएन सिंह ने बताया कि बहुजन समिति के 90 से ज्यादा फर्जी प्लॉट रद्द किए जाएंगे। जांच में सामने आया है कि इन प्लॉटों के दस्तावेज अधूरे या फर्जी थे और इन्हें ऐसे लोगों को दिया गया जो सदस्य बनने के योग्य ही नहीं थे।
विजिलेंस की अनदेखी, FIR तक नहीं
विजिलेंस डायरेक्टर ने दोषी अधिकारियों पर कार्रवाई के आदेश दिए, लेकिन एलडीए ने कोई कदम नहीं उठाया। सहकारिता विभाग ने 4 मई को हजरतगंज थाने में तहरीर दी, लेकिन अब तक एफआईआर दर्ज नहीं हुई। इसी तरह समिति के ही एक सचिव ने अपने ही पूर्व अध्यक्ष और सचिव के खिलाफ गाजीपुर थाने में तहरीर दी है।
20 से ज्यादा अफसरों पर संकट
आवास आयुक्त की रिपोर्ट में एलडीए के पूर्व वीसी सहित 20 अफसरों को दोषी ठहराया गया है। इन्होंने अपने रिश्तेदारों को समिति का सदस्य बनवाकर अवैध प्लॉट आवंटित कराए। अब इन अफसरों पर कार्रवाई की तलवार लटक रही है। सूत्रों का कहना है कि अगर कोर्ट को जवाब नहीं भाया, तो CBI या विजिलेंस जांच भी हो सकती है।
2008 से चल रहा था मामला, अब जाकर खुला
इस घोटाले की पहली शिकायत 2008 में हुई थी। 2010 में तत्कालीन वीसी ने जांच कर रिपोर्ट दी थी, लेकिन वह दबा दी गई। 2018 में दोबारा शिकायत हुई, और 2020 में मुख्यमंत्री ने हाई पावर कमेटी गठित की। 2024 में रिपोर्ट आई जिसमें कई अफसरों और समिति पदाधिकारियों को दोषी पाया गया।
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