बिहार उपचुनाव: चढ़ने लगी वंशवाद की बेल, लालू की विरासत आगे बढ़ाएंगे तेजस्वी

 

Sandesh Wahak Digital Desk: राष्ट्रीय जनता दल (राजद)का महागठबंधन एक बार फिर वंशवाद के सहारे चुनावी वैतरणी पार करने की कोशिश में लगी है। ऐसा नहीं है कि जद यू और बीजेपी गठबंधन में वंशवाद की बेल नहीं पनप रही है, लेकिन राजद की अपेक्षा वहां संख्या सीमित है।

गुरुवार को महागठबंधन ने पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव और राबड़ी देवी के पुत्र तेजस्वी यादव को सीएम पद का उम्मीदवार घोषित कर दिया। हालांकि जद यू और भाजपा गठबंधन ने अभी अपने पत्ते नहीं खोले हैं। बताते चलें कि निवर्तमान 243 सदस्यीय विधानसभा में 70 विधायक अपने वंश की परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं जो 28.81 फीसदी (एक चौथाई से ज्यादा) है।

सीएम पद के दावेदार के रूप में तेजस्वी यादव के नाम की घोषणा

बिहार में विधानसभा चुनाव की दुदुंभी बज चुकी हैं। सेनाएं तैयार हैं, व्यूह रचना तैयार की जा रही है। ऐसे में नेतृत्व की कमान किसे सौंपी जाए इस पर मंथन शुरू हो गया है। बिहार की राजनीति में वंश वाद या भाई-भतीजावाद कह लें, सदा से ही हावी रहा है। राजद महागठबंधन ने गुरुवार को इसी क्रम में सीएम पद के दावेदार के रूप में तेजस्वी यादव के नाम की घोषणा भी कर दी। बिहार के लोग इस नाम से अंजान नहीं है।

Tejashwi Yadav

वंश की परंपरा को ही बढ़ा रहे है विधायक

सभी जानते हैं कि वह राजद के संस्थापक लालू और राबड़ी के पुत्र हैं। मौजूदा समय में 243 सदस्यों वाली विधानसभा में 71 विधायक राजद के है, जिनमें 30 विधायक वंश की परंपरा को ही बढ़ा रहे है। वहीं जद यू के 44 विधायकों में 16, भाजपा के 80 विधायकों में 17 और कांग्रेस के 17 में से चार विधायक वंशवादी परंपरा से इस मुकाम तक पहुंचे है। लालू के पुत्र तेज प्रताप यादव, केंद्रीय मंत्री जीतन राम माझी की बहू दीपा, पूर्व कांग्रेसी नेता जगन्नाथ मिश्रा के पुत्र नीतीश मिश्रा और हरिहर सिंह के पुत्र अमरेंद्र प्रताप सिंह जैसे तमाम नाम सूची में है।

बिना वंश बेल के सहारे मंजिल तक पहुंच पाना नामुमकिन?

अब सवाल यह है कि मुकाम तक पहुंचने के लिए क्या वंशवाद की बेल का सहारा लेना जरूरी है। क्या बिना वंश बेल के सहारे के मंजिल तक पहुंच पाना नामुमकिन है। राजनीति के एक जानकार का कहना है कि मौजूदा समय में राजनीति भी एक कारोबार की तरह हो गई है। जैसे कारोबार में पिता की विरासत उसके बेटे-बहू संभालते हैं, ठीक उसी तरह राजनीतिक दल में भी संस्थापक के बेटे-बहू-पोते-पोतियां उनकी विरासत को आगे बढ़ाते हैं।

रिपोर्ट : राज कृष्ण पाण्डेय

 

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