बिहार चुनाव 2025: नीतीश-तेजस्वी की साख दांव पर, प्रशांत किशोर बने ‘तीसरा मोर्चा’
Sandesh Wahak Digital Desk: भारत निर्वाचन आयोग ने सोमवार (6 अक्टूबर, 2025) को बिहार विधानसभा चुनाव की तारीखों का ऐलान कर दिया है, जिसके साथ ही राज्य की 243 सीटों के लिए चुनावी रणभेरी बज चुकी है। इस बार 7.42 करोड़ से अधिक मतदाता अपने मताधिकार का प्रयोग करेंगे।
मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने बताया कि राज्य में मतदान दो चरणों में होगा और मतगणना छठ महापर्व को ध्यान में रखकर की जाएगी।
चरण मतदान की तिथि मतगणना की तिथि
पहला चरण 6 नवंबर –
दूसरा चरण 11 नवंबर –
नतीजे – 14 नवंबर
NDA बनाम महागठबंधन बनाम जन सुराज
इस चुनाव में मुख्य मुकाबला सत्ताधारी राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) और विपक्षी ‘इंडिया’ गठबंधन के बीच है। हालांकि, चुनावी रणनीतिकार से नेता बने प्रशांत किशोर की जन सुराज पार्टी ने सभी 243 सीटों पर चुनाव लड़ने का ऐलान कर मुकाबले को त्रिकोणीय और दिलचस्प बना दिया है।
NDA की रणनीति (नीतीश कुमार)
नेतृत्व: मुख्यमंत्री नीतीश कुमार (जेडीयू अध्यक्ष), जिनके सामने 20 साल बाद सत्ता-विरोधी लहर और नेतृत्व की थकान से मुकाबले की चुनौती है।
चुनावी नारा: विकास और ‘डबल इंजन की सरकार’ (केंद्र में मोदी, राज्य में नीतीश) पर जोर।
सामाजिक आधार: नीतीश कुमार खुद को अत्यंत पिछड़े वर्गों (EBC) का नेता बनाकर पेश करते हैं।
कमजोरी: बीजेपी और जेडीयू के बीच ‘बड़े भाई’ बनने की होड़ और नीतीश कुमार की गिरती सेहत की चर्चा।
विपक्षी महागठबंधन (तेजस्वी यादव)
नेतृत्व: आरजेडी नेता तेजस्वी यादव मुख्यमंत्री पद का चेहरा हैं। उनके सामने MY (मुस्लिम-यादव) वोट बैंक से आगे अपना आधार बढ़ाने की चुनौती है।
चुनावी अभियान: तेजस्वी ने ‘बिहार अधिकार यात्रा’ निकालकर बेरोजगारी, अपराध और वोटर सूची में गड़बड़ियों के मुद्दे पर नीतीश सरकार को घेरा है।
आंतरिक चुनौतियाँ: सीट बंटवारे पर असहमति, कांग्रेस का कमजोर जनाधार, और VIP (मुकेश सहनी) की उपमुख्यमंत्री पद सहित 60 सीटों की मांग।
राहुल गांधी: स्टार प्रचारक के रूप में उनकी रैलियों में भीड़ दिखी, लेकिन इस चुनाव में उनके नेतृत्व और कांग्रेस के जनाधार की बड़ी परीक्षा होगी।
तीसरा मोर्चा (प्रशांत किशोर)
पार्टी: जन सुराज, जो सभी 243 सीटों पर उम्मीदवार उतारेगी।
एजेंडा: जाति-आधारित राजनीति को तोड़कर शासन व्यवस्था और मौजूदा दलों की विफलताओं को मुख्य मुद्दा बनाना।
चुनौती: बिहार की दोध्रुवीय राजनीति को तोड़ना और करारी हार की स्थिति में अप्रासंगिक होने के खतरे का सामना करना।
साख दांव पर
इस चुनाव में न केवल एनडीए और महागठबंधन की किस्मत तय होगी, बल्कि कई बड़े नेताओं की राजनीतिक विरासत दांव पर है:
नीतीश कुमार: जीत से बिहार के सबसे लंबे समय तक मुख्यमंत्री की पहचान पक्की होगी, जबकि हार उनके राजनीतिक वर्चस्व का अंत हो सकती है।
तेजस्वी यादव: जीत उन्हें युवा राजनीति का नया चेहरा बनाएगी और हार उनकी ‘हमेशा दूसरे नंबर’ पर रहने वाले नेता की छवि को मजबूत कर सकती है।
चिराग पासवान (लोजपा-रामविलास): खुद को दलित चेहरा बताने वाले चिराग के लिए यह चुनाव ‘खेल बिगाड़ने वाले’ नेता की भूमिका से हटकर असली ताकतवर नेता बनने की चुनौती है।
Also Read: वाल्मीकि जयंती: यूपी और दिल्ली में आज सार्वजनिक अवकाश, स्कूल-कॉलेज बंद

