‘चाची की कचौड़ी’ और ‘पहलवान लस्सी’ की दुकान पर चला बुलडोजर

Sandesh Wahak Digital Desk: वाराणसी की गलियों से उठती चाची की गरमागरम कचौड़ियों की खुशबू और पहलवान की मीठी गाढ़ी लस्सी अब सिर्फ यादों में रह जाएंगी। मंगलवार रात शहर के रविदास गेट के पास स्थित ये दोनों ऐतिहासिक दुकानें लोक निर्माण विभाग के बुलडोजर की चपेट में आ गईं।

इन दुकानों का इतिहास कोई छोटा-मोटा नहीं था, बल्कि सौ साल पुरानी बनारसी पहचान का हिस्सा थीं। एक तरफ चाची की कचौड़ी, जो सुबह-सुबह बनारसियों के पेट ही नहीं, दिल को भी सुकून देती थी। वहीं दूसरी तरफ पहलवान की लस्सी, जो मीठे स्वाद के साथ बनारसी तहज़ीब का रस भी घोल देती थी।

सड़क चौड़ीकरण की योजना बनी दुकानों के अंत की वजह

लंका चौराहे से विजया मॉल तक बन रही 9.5 किलोमीटर लंबी फोरलेन सड़क के कारण कुल 24 से अधिक दुकानें हटाई जा रही हैं। पहले ही इन सभी दुकानदारों को नोटिस देकर जगह खाली करने के लिए कहा गया था। हालांकि, अब जब तोड़फोड़ शुरू हुई, तो इलाके में सिर्फ मलबा नहीं गिरा, बल्कि बनारस के लोगों की यादें, भावनाएं और रोज़मर्रा की ज़िंदगी भी बिखर गई।

आंखों में आंसू, दिल में सवाल

जिन लोगों की सुबहें चाची की कचौड़ी और पहलवान की लस्सी से होती थीं, उनके लिए अब लंका चौराहे का वो स्वाद भरा कोना सिर्फ एक खाली जगह बन गया है। राह चलते एक बुजुर्ग बोले, “अब कहां खाएंगे वो गरमागरम कचौड़ी… और वो लस्सी जो दिन बना देती थी?”

प्रशासन की तरफ से कहा गया है कि प्रभावित दुकानदारों और मकान मालिकों को मुआवजा दिया जाएगा। एक लिस्ट तैयार की जा रही है, लेकिन जिनका सब कुछ इस ज़मीन पर था, उनके लिए पैसे से ज़्यादा ज़रूरी वो पहचान थी, जो अब मिट चुकी है।

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