चुनाव बहिष्कार पर बहस, क्या विपक्ष के बिना भी हो सकते हैं चुनाव, जानें क्या कहते हैं नियम

Sandesh Wahak Digital Desk: राष्ट्रीय जनता दल (RJD) के नेता तेजस्वी यादव ने बिहार विधानसभा चुनावों के बहिष्कार का जो संकेत दिया है, उसने पूरे देश में एक नई राजनीतिक बहस छेड़ दी है। यूँ तो चुनाव लड़ना या न लड़ना किसी भी राजनीतिक दल का अपना फैसला होता है, लेकिन जब विपक्ष का सबसे बड़ा चेहरा इस तरह की बात करता है, तो सवाल उठना लाज़मी है। सबसे बड़ा सवाल यही है कि अगर पूरा विपक्ष ही चुनाव का बहिष्कार कर दे, तो क्या इस स्थिति में चुनाव कराए जा सकते हैं?

क्या कहता है संविधान

भारतीय संविधान का अनुच्छेद 324 चुनाव आयोग को निष्पक्ष और स्वतंत्र चुनाव कराने का पूरा अधिकार देता है। इसमें यह साफ लिखा है कि लोकसभा और सभी राज्यों की विधानसभाओं के चुनाव वयस्क मताधिकार के आधार पर होंगे। लेकिन, चुनाव आयोग के नियमों में कहीं भी ऐसा ज़िक्र नहीं है कि अगर कोई राजनीतिक दल चुनाव का बहिष्कार करे, तो चुनाव प्रक्रिया को रोक दिया जाएगा।

जब पार्टियों ने बहिष्कार किया, तब क्या हुआ

इतिहास में ऐसे कई उदाहरण हैं, जहाँ कुछ पार्टियों के बहिष्कार के बावजूद चुनाव हुए हैं।

दिल्ली का मेयर चुनाव (2025): हाल ही में आम आदमी पार्टी (AAP) ने मेयर चुनाव का बहिष्कार किया था, लेकिन चुनाव प्रक्रिया पूरी हुई और राजा इकबाल सिंह मेयर चुने गए।

अन्य राज्यों में: 1989 में मिजोरम, 1999 में जम्मू-कश्मीर और 2014 में हरियाणा विधानसभा चुनावों में कुछ पार्टियों ने आंशिक बहिष्कार किया था, लेकिन चुनाव हुए और नतीजे भी आए।

इन मामलों में सुप्रीम कोर्ट ने भी साफ कहा है कि अगर चुनाव प्रक्रिया संवैधानिक मानकों का पालन करती है, तो ‘बहिष्कार’ किसी चुनाव को रद्द करने का आधार नहीं हो सकता है।

चुनाव बहिष्कार का दलों पर क्या असर

‘चुनाव बहिष्कार’ का फैसला राजनीतिक दलों के लिए एक बड़ा जोखिम हो सकता है। 1968 के चुनाव चिन्ह आदेश के अनुसार, अगर कोई राजनीतिक दल लगातार चुनावों से दूरी बनाता है या उसे न्यूनतम वोट नहीं मिलते, तो उसकी मान्यता रद्द की जा सकती है।

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