46 साल पुरानी अधिसूचना को चुनौती, Delhi High Court ने सुनवाई से किया इनकार

Sandesh Wahak Digital Desk: दिल्ली हाई कोर्ट (Delhi High Court) ने सोमवार 23 फरवरी को वर्ष 1980 की वक्फ अधिसूचना को चुनौती देने वाली एक जनहित याचिका खारिज कर दी। इस याचिका में जहांगीरपुरी स्थित तीन मस्जिदों को सार्वजनिक भूमि पर अवैध कब्जा बताया गया था। याचिका एक गैर सरकारी संगठन सेव इंडिया द्वारा दायर की गई थी।

कोर्ट ने जनहित पर उठाए सवाल

हाई कोर्ट (Delhi High Court) ने पाया कि सेव इंडिया की यह याचिका वास्तविक जनहित में नहीं है। अदालत ने स्पष्ट कहा कि वह इस याचिका पर सुनवाई के लिए इच्छुक नहीं है और इसे लंबित अर्जियों के साथ खारिज किया जाता है। कोर्ट ने यह भी कहा कि करीब 46 वर्ष पहले जारी किए गए नोटिफिकेशन को छोटी-मोटी बातों के आधार पर चुनौती नहीं दी जा सकती।

यहां कोर्ट (Delhi High Court) ने कहा कि याचिकाकर्ता सुलझे हुए मुद्दों को बेवजह दोबारा खोलने का प्रयास कर रहा है। अदालत के अनुसार यह याचिका न तो विधिसम्मत है और न ही जनहित में है। सुनवाई के दौरान यह भी उल्लेख किया गया कि संगठन ने वर्ष 2024 से 2026 के बीच 37 जनहित याचिकाएं और 11 रिट याचिकाएं दायर की हैं। पीआईएल के दुरुपयोग के खिलाफ चेतावनी देते हुए अदालत ने कहा कि जनहित याचिका की पवित्रता को किसी भी कीमत पर कम नहीं होने दिया जा सकता।

मुख्य न्यायाधीश डी के उपाध्याय और न्यायमूर्ति तेजस कारिया की पीठ ने कहा कि सेव इंडिया फाउंडेशन द्वारा दायर यह याचिका सद्भावना या वास्तविक जनहित से प्रेरित प्रतीत नहीं होती। इसलिए इसे विचार योग्य नहीं माना जा सकता और खारिज किया जाता है।

क्या था पूरा मामला?

याचिकाकर्ता ने दिल्ली वक्फ बोर्ड द्वारा 24 मार्च 1980 को जारी अधिसूचना को चुनौती दी थी। इस अधिसूचना के तहत कुछ संपत्तियों को सुन्नी वक्फ संपत्ति घोषित किया गया था। इनमें जहांगीरपुरी स्थित मोती मस्जिद, जामा मस्जिद और एक अन्य मस्जिद शामिल हैं।

याचिका में दावा किया गया था कि जिस जमीन पर ये संपत्तियां स्थित हैं, उसे दिल्ली सरकार ने वर्ष 1977 में मालिकों को मुआवजा देकर अधिग्रहित कर लिया था। इसलिए उस भूमि पर किसी भी प्रकार का निर्माण सार्वजनिक भूमि पर अवैध अतिक्रमण की श्रेणी में आता है और उन्हें वक्फ संपत्ति के रूप में सूचीबद्ध नहीं किया जा सकता।

याचिकाकर्ता का यह भी कहना था कि यह अधिग्रहण दिल्ली के सुनियोजित विकास के लिए किया गया था और बाद में जमीन दिल्ली विकास प्राधिकरण को सौंप दी गई थी। इन भूखंडों को जहांगीरपुरी नामक सुनियोजित कॉलोनी के औपचारिक लेआउट प्लान में शामिल किया गया था।

तुच्छ याचिकाओं पर रोक जरूरी

अपने फैसले में कोर्ट (Delhi High Court) ने कहा कि याचिकाकर्ता बार-बार याचिकाएं दायर कर उन्हें जनहित का नाम देता है और अनावश्यक रूप से अतीत के मामलों को कुरेदने का प्रयास करता है। अदालत ने स्पष्ट किया कि 46 वर्ष पहले जारी अधिसूचना को मामूली आधारों पर चुनौती देने की अनुमति नहीं दी जा सकती।

यहां कोर्ट (Delhi High Court) ने दोहराया कि जनहित याचिका की पवित्रता बनाए रखना आवश्यक है। उच्चतम न्यायालय के निर्देशों का उल्लेख करते हुए अदालत ने कहा कि यह न्यायालयों का दायित्व है कि तुच्छ या दुर्भावनापूर्ण याचिकाओं को प्रारंभिक स्तर पर ही रोका जाए, ताकि न्यायिक प्रक्रिया का दुरुपयोग न हो सके।

 

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