लखनऊ में ‘डिजिटल अरेस्ट’ गिरोह का भंडाफोड़, फर्जी ATS ऑफिसर बनकर 90 लाख ठगने वाले 3 शातिर गिरफ्तार

Sandesh Wahak Digital Desk: लखनऊ पुलिस ने ‘डिजिटल अरेस्ट’ के नाम पर बुजुर्गों और मासूम लोगों को अपना शिकार बनाने वाले एक बड़े गिरोह का पर्दाफाश किया है। फर्जी एटीएस (ATS) अधिकारी बनकर इस गिरोह ने एक परिवार से ₹90 लाख की ठगी की थी।

लखनऊ साइबर क्राइम पुलिस ने तीन ऐसे जालसाजों को गिरफ्तार किया है, जो खुद को पुलिस और सरकारी अधिकारी बताकर लोगों को डिजिटल अरेस्ट करते थे और उनके जीवन भर की जमापूंजी लूट लेते थे।

90 लाख की सनसनीखेज ठगी

ठगी की शुरुआत 26 जनवरी 2026 को हुई, जब लखनऊ निवासी वीना बाजपेयी के पास एक फोन आया। फोन करने वाले ने खुद को ATS मुख्यालय का इंस्पेक्टर ‘रंजीत कुमार’ बताया। जालसाजों ने उन पर मनी लॉन्ड्रिंग और आतंकवाद जैसे गंभीर अपराधों में शामिल होने का आरोप लगाकर डराया।

उन्हें सिग्नल ऐप (Signal App) डाउनलोड करने पर मजबूर किया गया, जहां ‘अजय प्रताप श्रीवास्तव’ नाम के एक और फर्जी अधिकारी ने सुप्रीम कोर्ट के फर्जी आदेश दिखाकर उन्हें डराया कि अगर वे अपने बैंक खाते की जांच के लिए पैसे ट्रांसफर नहीं करेंगे, तो उन्हें तुरंत गिरफ्तार कर लिया जाएगा। डर और मानसिक दबाव में आकर पीड़ित परिवार ने 29 जनवरी से 9 फरवरी के बीच अलग-अलग किश्तों में कुल ₹90,00,000/- ठगों के बताए खातों में ट्रांसफर कर दिए। हद तो तब हो गई जब आरोपियों ने ₹11 लाख की और मांग की और न देने पर जान से मारने की धमकी दी।

पुलिस की कार्रवाई और गिरफ्तारी

मामले की गंभीरता को देखते हुए लखनऊ पुलिस कमिश्नर के निर्देशन में साइबर क्राइम थाने के प्रभारी बृजेश कुमार यादव के नेतृत्व में एक विशेष टीम गठित की गई। टीम ने तकनीकी साक्ष्यों के आधार पर जाल बिछाया और 3 शातिर अपराधियों को दबोच लिया।

गिरफ्तार अभियुक्त

मयंक श्रीवास्तव (24 वर्ष): निवासी गोरखपुर। यह गिरोह को अपना बैंक खाता और मोबाइल उपलब्ध कराता था।

इरशाद (23 वर्ष): निवासी गाजियाबाद। यह लालच देकर नए लोगों के बैंक खाते और दस्तावेज जुटाता था।

मनीष कुमार उर्फ आकाश (24 वर्ष): निवासी दिल्ली। यह गिरोह के मुख्य सरगना ‘जीतू’ के लिए काम करता था और पैसों का मैनेजमेंट देखता था।

कैसे काम करता था यह गिरोह?

पूछताछ में खुलासा हुआ कि यह गिरोह बेहद योजनाबद्ध तरीके से काम करता था। ये कर्ज में डूबे युवाओं को कमीशन का लालच देकर उनके नाम पर बैंक खाते खुलवाते थे। फिर खाताधारक को दिल्ली या नोएडा के होटलों (जैसे पहाड़गंज या परी चौक) में रुकवा देते थे ताकि पुलिस उन तक न पहुंच सके। पुलिस को जांच में पता चला कि मयंक के खाते में केवल 9 फरवरी को ही ₹1.06 करोड़ आए थे, जिसकी शिकायतें तमिलनाडु और अन्य राज्यों से भी दर्ज थीं। ये व्हाट्सएप कॉल के जरिए खुद को CBI/ATS अधिकारी बताकर पीड़ितों को वीडियो कॉल पर घंटों ‘बंधक’ रखते थे और गिरफ्तारी का डर दिखाकर पैसे वसूलते थे।

बरामदगी

03 स्मार्ट मोबाइल फोन

ICICI और HDFC बैंक की चेकबुक

ICICI बैंक का डेबिट कार्ड

पुलिस की विशेष सलाह: रहें सावधान!

डिजिटल अरेस्ट कुछ नहीं होता: भारत में ‘डिजिटल अरेस्ट’ जैसा कोई कानूनी प्रावधान नहीं है। कोई भी सरकारी एजेंसी फोन या वीडियो कॉल पर किसी को गिरफ्तार नहीं करती।

धमकी से न डरें: यदि कोई पुलिस अधिकारी बनकर कॉल करे और डराए, तो तुरंत फोन काटें और स्थानीय पुलिस को सूचना दें।

रिपोर्ट करें: ठगी होने पर बिना देरी किए राष्ट्रीय साइबर हेल्पलाइन नंबर 1930 पर कॉल करें या cybercrime.gov.in पर शिकायत दर्ज करें।

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