रेंट एग्रीमेंट नहीं होने पर भी बेदखली संभव, हाई कोर्ट का बड़ा फैसला
Sandesh Wahak Digital Desk: इलाहाबाद हाई कोर्ट (Allahabad High Court) ने किरायेदारी से जुड़े विवादों पर एक अहम और दूरगामी असर डालने वाला फैसला सुनाया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि अगर किसी मकान मालिक और किरायेदार के बीच कोई लिखित रेंट एग्रीमेंट नहीं है या किरायेदारी का विवरण किराया प्राधिकरण के समक्ष प्रस्तुत नहीं किया गया है, तब भी इससे किराया प्राधिकरण का अधिकार क्षेत्र खत्म नहीं होता। हाई कोर्ट ने साफ कहा है कि उत्तर प्रदेश शहरी परिसर किरायेदारी विनियमन अधिनियम, 2021 के तहत गठित किराया प्राधिकरण ऐसे मामलों में भी मकान मालिक के बेदखली से जुड़े आवेदनों पर सुनवाई करने और निर्णय लेने के लिए पूरी तरह सक्षम है।
तकनीकी कमियों से नहीं छीना जा सकता अधिकार
हाई कोर्ट (Allahabad High Court) ने इस बात पर जोर दिया कि राज्य विधानमंडल ने जानबूझकर केंद्रीय मॉडल किरायेदारी अधिनियम में मौजूद “गंभीर परिणामों” से जुड़े प्रावधानों को हटाया है। इसका मकसद यही था कि केवल तकनीकी दस्तावेजीकरण की नाकामी के कारण मकान मालिकों को शीघ्र बेदखली की मांग करने के उनके अधिकार से वंचित न किया जाए। कोर्ट ने माना कि कानून का उद्देश्य तभी पूरा हो सकता है, जब तकनीकी बाधाओं को अधिकारों के रास्ते में रुकावट न बनने दिया जाए।
यह फैसला 16 दिसंबर को सुनाया गया, जिसमें हाई कोर्ट ने केनरा बैंक की ब्रांच ऑफिस और अन्य याचिकाकर्ताओं द्वारा दायर रिट याचिकाओं को आंशिक रूप से स्वीकार कर लिया। इन याचिकाओं में मुख्य विवाद यही था कि क्या बिना किसी लिखित रेंट एग्रीमेंट के भी किराया प्राधिकरण मकान मालिकों के आवेदनों पर सुनवाई कर सकता है या नहीं। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि कानून की मंशा को देखते हुए किराया प्राधिकरण का अधिकार केवल लिखित समझौतों तक सीमित नहीं किया जा सकता।
धारा 9(5) ने स्पष्ट किया विधायी उद्देश्य
जस्टिस रोहित रंजन अग्रवाल ने अपने फैसले में कहा कि उत्तर प्रदेश शहरी परिसर किरायेदारी विनियमन अधिनियम, 2021 की धारा 9 की उप-धारा (5) यह संकेत देती है कि किराया प्राधिकरण का अधिकार क्षेत्र केवल उन्हीं मामलों तक सीमित नहीं है, जिनमें लिखित समझौता मौजूद हो और उसकी सूचना किराया प्राधिकरण को दी गई हो। उन्होंने यह भी कहा कि विधानमंडल की मंशा का आकलन किसी एक प्रावधान से नहीं, बल्कि पूरे कानून, उसके संदर्भ, विषय-वस्तु और उद्देश्य को ध्यान में रखकर किया जाना चाहिए।
कोर्ट (Allahabad High Court) ने यह भी माना कि यदि मकान मालिक और किरायेदार के बीच कोई लिखित समझौता नहीं है या दोनों पक्ष मिलकर कोई एग्रीमेंट पेश नहीं कर पाए हैं, तब भी किरायेदारी से जुड़ी वह जानकारी जो पक्षकारों द्वारा किराया प्राधिकरण को अलग से जमा कराई गई है, उसे पर्याप्त माना जाएगा। इससे यह साफ होता है कि किराया प्राधिकरण को ऐसे मामलों में भी विवादों के निस्तारण का अधिकार प्राप्त है।
रद्द किए गए पुराने आदेश
हाई कोर्ट ने उन सभी आदेशों को रद्द कर दिया जिनमें केवल लिखित रेंट एग्रीमेंट के अभाव के कारण बेदखली के आवेदनों को गैर-मान्य घोषित कर दिया गया था। कुछ मामलों को नए सिरे से फैसले के लिए वापस भेजा गया, जबकि कुछ मामलों में सीधे बेदखली के आदेश भी जारी कर दिए गए। कुछ याचिकाओं में किरायेदारों को छह महीने का ग्रेस पीरियड इस शर्त पर दिया गया कि वे औपचारिक अंडरटेकिंग दाखिल करें और सभी बकाया रकम का भुगतान सुनिश्चित करें।
इस फैसले के बाद यह साफ हो गया है कि उत्तर प्रदेश में किरायेदारी विवादों के निपटारे के लिए अब केवल लिखित एग्रीमेंट ही निर्णायक आधार नहीं रहेगा। तकनीकी कमियों की आड़ में अब न तो किरायेदार राहत ले सकेंगे और न ही मकान मालिकों के वैधानिक अधिकारों को रोका जा सकेगा। यह फैसला आने वाले समय में प्रदेश के हजारों किरायेदारी विवादों की दिशा और दशा दोनों बदलने वाला माना जा रहा है।

