सीबीआई के पूर्व टॉप अधिकारियों पर सबूतों से छेड़छाड़ और धमकी देने के आरोप में FIR दर्ज

Sandesh Wahak Digital Desk: देश की प्रमुख जाँच एजेंसी सीबीआई (CBI) के दो पूर्व वरिष्ठ अधिकारियों की मुश्किलें बढ़ गई हैं। सुप्रीम कोर्ट (SC) के सख्त आदेश के बाद, दिल्ली क्राइम ब्रांच ने 1 अक्टूबर को सीबीआई के तत्कालीन निरीक्षक विनोद कुमार पांडे और तत्कालीन संयुक्त निदेशक नीरज कुमार के खिलाफ दो अलग-अलग FIR (संख्या 281 और 282) दर्ज की हैं।

यह मामला 1999 से 2001 के बीच हुई कथित घटनाओं से जुड़ा है, जहाँ इन अधिकारियों पर सबूतों से छेड़छाड़, पद के दुरुपयोग और धमकी देने के गंभीर आरोप लगे थे।

सुप्रीम कोर्ट ने सितंबर 2025 में इस मामले की जाँच बहाल करने का निर्देश दिया था। कोर्ट ने कहा था कि गंभीर आरोपों की दो दशकों से भी ज़्यादा समय तक जाँच न होना न्याय का उपहास है। सुप्रीम कोर्ट का यह हस्तक्षेप तब आया जब उसने आरोपियों द्वारा दायर चार अपीलों को खारिज कर दिया। इन अपीलों में दिल्ली हाई कोर्ट के 2006 के उन आदेशों को चुनौती दी गई थी, जिनमें प्राथमिकी दर्ज करने और आपराधिक अवमानना कार्यवाही शुरू करने का निर्देश दिया गया था।

जालसाजी और दस्तावेजों से छेड़छाड़ का आरोप

पहली FIR (संख्या 281) कारोबारी विजय कुमार अग्रवाल के अकाउंटेंट शीश राम सैनी ने दर्ज कराई है। इसमें कहा गया है कि 1999-2000 में उनके दफ्तर पर छापेमारी के दौरान, विनोद कुमार पांडे और अन्य ने बिना किसी कानूनी दस्तावेज के कंपनी के रिकॉर्ड जब्त कर लिए।

बाद में अधिकारियों पर जाली जब्ती ज्ञापन बनाने, बदली हुई तारीखें दर्ज करने और सरकारी रिकॉर्ड में हेराफेरी करने का आरोप है। आरोप है कि शीश राम सैनी को दबाव में आकर फर्जी दस्तावेजों पर हस्ताक्षर करने के लिए मजबूर किया गया।

धमकाना और जबरन बंधक बनाना

दूसरी FIR (संख्या 282) खुद विजय कुमार अग्रवाल ने दर्ज कराई है। यह 2001 की घटना से संबंधित है। इसमें नीरज कुमार और विनोद पांडे पर CBI कार्यालय में उन्हें धमकाने, गाली-गलौज करने और दबाव डालने का आरोप है। उनका मकसद था कि विजय अग्रवाल अपने भाई को उनके खिलाफ दर्ज कानूनी मामला वापस लेने के लिए मजबूर करें।

विजय अग्रवाल का दावा है कि उन्हें गलत तरीके से बंधक बनाया गया और उनके साथ जबरदस्ती की गई। जब लोधी कॉलोनी पुलिस स्टेशन ने शिकायत दर्ज करने से मना कर दिया, तो उन्हें हाईकोर्ट जाना पड़ा।

सुप्रीम कोर्ट ने साफ आदेश दिया है कि दिल्ली पुलिस के ACP स्तर के अधिकारी द्वारा इस मामले की स्वतंत्र जांच की जाए। यदि आवश्यक हो तो आरोपी को गिरफ्तार करने का भी अधिकार दिया गया है। फिलहाल, क्राइम ब्रांच ने जांच शुरू कर दी है और आरोपियों को सहयोग करने का निर्देश दिया है।

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