संपादक की कलम से: बाढ़ की विभीषिका पर मंथन जरूरी

Sandesh Wahak Digital Desk: मानसून जैसे-जैसे अपना दायरा बढ़ा रहा है, यूपी के कई जिलों में नदिया उफान पर पहुंच गयी है। भारी बारिश के कारण गंगा नदी का जलस्तर तेजी से बढ़ रहा है। वाराणसी के घाट जलमग्न हो गए हैं। चित्रकूट में मंदाकिनी नदी उफान पर है। इसके अलावा यमुना और अन्य नदियां भी अपने तट छोडक़र निकटवर्ती गांव की ओर बढऩे लगी हैं। इसके कारण बाढ़ का खतरा एक बार फिर मंडराने लगा है और नदी किनारे स्थित गांववासियों की चिंता बढ़ गयी है। वहीं सरकार ने राहत और बचाव कर्मियों को अलर्ट मोड पर रखा है व लोगों को नदियों की ओर जाने से मना किया जा रहा है।

बड़ा सवाल यह है कि :

  • बाढ़ से हर बार धन-जन की हानि होने के बावजूद इसकी तीव्रता को कम करने का कोई ठोस उपाय क्यों नहीं किया जा रहा है?
  • क्यों हर बार बाढ़ पिछले वर्ष से अधिक भयावह रूप ले लेती है?
  • क्या राहत और बचाव कार्य के अलावा सरकार के पास कोई अन्य विकल्प नहीं हैं?
  • क्या प्राकृतिक जलस्रोतों के नष्ट होने और बारिश का सारा पानी नदी तक पहुंचने के कारण हालात खराब हो रहे हैं?
  • क्या बाढ़ की विभिषिका को कम करने के लिए कोई उपाय नहीं है?

हर साल मानसून के दौरान देश के कई प्रदेशों में बाढ़ आती है और अपने पीछे व्यापक धन-जन की हानि छोड़ जाती है। यूपी भी इससे अछूता नहीं है। यूपी में कई बड़ी नदियां बहती हैं। बारिश के दौरान इसका जलस्तर बढ़ जाता है और इनका पानी तमाम गांवों को जलमग्न कर देता है। हालांकि सरकार हर बार बाढ़ को देखते हुए राहत-बचाव की पूरी तैयारी रखती है। बावजूद इसके काफी नुकसान होता है। इसका सीधा असर राजकोष पर पड़ता है क्योंकि सरकार बाढ़ जैसी प्राकृतिक आपदा से प्रभावितों की आर्थिक मदद करती है।

बाढ़ की विकरालता के पीछे कई कारण जिम्मेदार

हैरानी की बात यह है कि मानसून के दौरान हर साल आने वाली बाढ़ को लेकर न तो केंद्र और न ही राज्य सरकारें गंभीर हैं। वे सिर्फ राहत और बचाव कार्य तक अपने को सीमित कर चुकी हैं। दरअसल, बाढ़ की विकरालता के पीछे कई कारण जिम्मेदार हैं। बारिश के दौरान नदियों के तल पर लगातार मिट्टी और कंकड़ जमा होते रहते हैं। इससे नदियों की गहराई कम हो गयी है। इसका असर इनके जलभरण क्षमता पर पड़ता है और वे बारिश के दौरान भयावह हो जाती हैं।

वहीं बारिश का सारा पानी प्राकृतिक जलस्रोतों तालाब, पोखर और कुंओं के विलुप्त होने के कारण नालों के जरिए नदी में पहुंच जाता है। इससे भी नदियां उफान पर जल्द आ जाती है। वहीं कई स्थानों पर लोग नदी की पेटी में बस्तियां बसा चुके हैं जो बारिश के दौरान नदी की चपेट में आ जाते हैं। साफ है यदि सरकार बाढ़ की विकरालता को कम करना चाहती है तो उसे नदियों के तल की न केवल सफाई करनी होगी बल्कि उसे गहरा भी करना होगा। साथ ही प्राकृतिक जलस्रोतों की श्रृंखला बनानी होगी ताकि बारिश का पानी इसमें संरक्षित किया जाए अन्यथा हालात सुधरेंगे नहीं।

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