गारंटी जो गारंटी नहीं है

भारत को आज़ाद हुए 78 साल हो गए हैं, लेकिन इस देश के नागरिकों को उनके बेसिक अधिकार नहीं मिल पाए हैं। किसी भी देश की खुशहाली और तरक्की की निशानी यह है कि उस देश के नागरिकों को उनके बेसिक अधिकार और सुविधाएं आसानी से मिल जाएं। दुनिया के सभी देश जिन अधिकारों को बेसिक अधिकार मानते हैं, उनमें शिक्षा भी शामिल है। यानी, सरकार की ज़िम्मेदारी है कि वह देश के हर नागरिक को बेसिक शिक्षा दे, ताकि देश का हर नागरिक अपनी ज़रूरत के हिसाब से पढ़-लिख सके। हमारे देश में मनमोहन सिंह जी की मिनिस्ट्री ने राइट टू एजुकेशन एक्ट बनाकर इस फील्ड में तरक्की तो की थी, लेकिन करप्ट सिस्टम ने इसका उतना फ़ायदा नहीं होने दिया, जितना मिलना चाहिए था, लेकिन किसी भी हाल में, कुछ न होने से तो कुछ होना ही बेहतर है। सरकारी कर्मचारियों ने इस कानून का पूरा फ़ायदा उठाया और प्राइवेट स्कूल चलाने वालों को इसका फ़ायदा पहुंचाया। सरकार ने खुद इसकी ज़िम्मेदारी नहीं उठाई, न ही ऐसा करने की ज़हमत उठाई। कम से कम इससे यह तो पता चलेगा कि सरकार की इस कोशिश में कितने बच्चे स्कूल गए हैं या कितने स्कूलों की ज़रूरत है या सरकार भविष्य में कितने और स्कूल खोलने का इरादा रखती है। हाँ, कुछ प्रांतों में यह ज़रूर हुआ है कि बच्चों की कमी के कारण स्कूलों को मर्ज करने का फ़ैसला किया गया और शिक्षा का अधिकार कानून बनाने की माँग कहीं न कहीं अपने मकसद में कामयाब होती नहीं दिख रही है।

इसी तरह, किसी भी देश के नागरिक को उस देश की सरकार से उतना रोज़गार ज़रूर मिलना चाहिए जितनी उसकी सख़्त ज़रूरत पूरी हो सके। इस बारे में भी भारत सरकार ने साठ साल बाद एक गंभीर फ़ैसला लिया और देश के ग्रामीण इलाकों में रहने वाले हर भारतीय को कम से कम 100 दिन के रोज़गार की गारंटी दी और इसे ग्रामीण विकास योजना के साथ जोड़ा। देश के बेरोज़गार नागरिकों को इससे काफ़ी फ़ायदा हुआ। इससे न सिर्फ़ लोगों को मज़दूरी मिलने में मदद मिली, बल्कि सबसे गरीब प्रांत में एक मज़दूरी का पैमाना भी तय हुआ, ताकि सरकार के अलावा दूसरे लोग भी कम से कम एक तय दर पर मज़दूरी देने के लिए मजबूर हों, जिससे गाँव वालों की आर्थिक हालत में सुधार हुआ। लेकिन दूसरी तरफ, इस एम्प्लॉयमेंट गारंटी की वजह से कैपिटलिस्ट और फैक्ट्री मालिकों को सस्ते लेबर मिलने लगे और फैक्ट्री मालिकों को भी मज़दूरी का रेट बढ़ाना पड़ा। मौजूदा सरकार पिछले कई सालों से इस एम्प्लॉयमेंट गारंटी को बदलने की कोशिश कर रही थी, लेकिन नोटबंदी, कोरोना लॉकडाउन, चुनाव वगैरह की वजह से ऐसा नहीं कर पा रही थी। अब जब बिहार का चुनाव खत्म हो गया है, क्योंकि देश में सबसे ज़्यादा लेबर बिहार से आते हैं, तो बिहार चुनाव के बाद यह अमेंडमेंट बिल पेश किया गया और इसमें इतना अमेंडमेंट किया गया है कि गारंटी की असली भावना ही खत्म हो गई है।

अमेंडमेंट की कुछ खास बातें और इसके नुकसान ऐसे हैं जिन्हें नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता। जैसे, पहले केंद्र सरकार इस एम्प्लॉयमेंट गारंटी के लिए बजट का 90 परसेंट देती थी, अब इसे घटाकर 60 परसेंट कर दिया गया है। पहले हर राज्य को इसे ज़रूरी तौर पर लागू करना पड़ता था, अब राज्यों को इस ज़रूरत से छूट दे दी गई है। पहले यह रोज़गार गारंटी एक समय सीमा में बंधी थी, अब नए बिल ने इस मामले में इसे अनिश्चित कर दिया है, यानी सरकार रोज़गार देने की गारंटी तो देती है, लेकिन यह किस तारीख को मिलेगा, इसकी कोई गारंटी नहीं दी जा सकती। जानकार लोग यह डर ज़ाहिर कर रहे हैं कि नए बिल की वजह से गरीब राज्यों की सरकारें खुद गरीबी में चली जाएंगी। यानी रोज़गार की गारंटी तो है, लेकिन गारंटी की कोई गारंटी नहीं है। इसलिए, विकसित देश बनने के लिए ज़रूरी औज़ारों में अधिकारियों की नियुक्ति के अलावा हमारे पास कोई और औज़ार नहीं है। इससे भी ज़्यादा दिलचस्प बात यह है कि विपक्ष के नेता को इस बात की जानकारी नहीं है कि भारतीय लोग किन मुद्दों को अपनी समस्या मानते हैं और किन मुद्दों पर लोग विरोध करने के लिए आकर्षित होते हैं।

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