‘बिहार में नाम जोड़ने से ज़्यादा हटाने के आ रहे हैं आवेदन’, SC में चुनाव आयोग का बड़ा खुलासा

बिहार में मतदाता सूची पुनरीक्षण पर चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि नाम हटवाने के लिए ज्यादा आवेदन आ रहे हैं। जानें, इस मामले में कोर्ट और राजनीतिक दलों की प्रतिक्रिया।

Sandesh Wahak Digital Desk: बिहार में चल रहे स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) को लेकर चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट में एक चौंकाने वाला बयान दिया है। आयोग ने कोर्ट को बताया कि मतदाता सूची से नाम जुड़वाने के बजाय नाम हटवाने के लिए ज्यादा आवेदन आ रहे हैं। यह सुनकर सुप्रीम कोर्ट के जज भी हैरान रह गए और उन्होंने पूछा कि आखिर राजनीतिक दल नाम हटाने का आवेदन क्यों दे रहे हैं।

सोमवार को इस मामले की सुनवाई में, याचिकाकर्ताओं की ओर से वकील प्रशांत भूषण ने मांग की कि ड्राफ्ट लिस्ट में छूटे हुए लोगों के लिए आपत्ति दर्ज कराने की समय सीमा बढ़ाई जाए और सिर्फ आधार कार्ड की कमी के कारण आवेदन खारिज न किए जाएं।

चुनाव आयोग की ओर से पेश हुए वकील राकेश द्विवेदी ने समय सीमा बढ़ाने का विरोध करते हुए कहा कि इससे चुनावी प्रक्रिया में देरी होगी। उन्होंने कहा, “राजनीतिक दल नाम जोड़ने से ज़्यादा नाम हटाने के आवेदन दे रहे हैं, जो यह साबित करता है कि हमारी प्रक्रिया सही है।” उन्होंने कोर्ट को यह भी बताया कि कई मामलों में खुद मतदाता अपना नाम हटाने के लिए आवेदन कर रहे हैं, क्योंकि उनका नाम कहीं और की वोटर लिस्ट में है।

‘बाढ़ से कोई दिक्कत नहीं, लोग खुद ले रहे हैं हिस्सा’

सुप्रीम कोर्ट ने इस पर हैरानी जताई कि राजनीतिक पार्टियों ने नाम जोड़ने के लिए सिर्फ 100-120 आवेदन ही दिए हैं। राकेश द्विवेदी ने यह भी कहा कि लोग खुद इस प्रक्रिया में बढ़-चढ़कर हिस्सा ले रहे हैं। उन्होंने एक एनजीओ (ADR) पर निशाना साधते हुए कहा कि जिसका बिहार से कोई संबंध नहीं, वह दावा कर रहा है कि बाढ़ की वजह से लोगों को दिक्कत हो रही है, जबकि ऐसा नहीं है।

राकेश द्विवेदी ने कोर्ट को साफ किया कि 1 सितंबर के बाद भी लोगों को आपत्ति/दावा दाखिल करने से नहीं रोका जा रहा, लेकिन उन पर फाइनल लिस्ट जारी होने के बाद ही विचार किया जाएगा। उन्होंने यह भी कहा कि बिहार चुनाव के लिए उम्मीदवारों के नामांकन तक लोगों के नाम वोटर लिस्ट में जोड़े जा सकते हैं। आधार कार्ड को पर्याप्त दस्तावेज माने जाने की याचिकाकर्ताओं की मांग पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि आधार को कानून में जितना महत्व दिया गया है, उससे ज़्यादा नहीं बढ़ाया जा सकता।

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