बार-बार भूलना सामान्य थकान या Dementia का संकेत?
Sandesh Wahak Digital Desk: आजकल बार-बार छोटी-छोटी बातें भूल जाना आम समस्या बनती जा रही है। कभी चाबियां कहां रखी थीं यह याद नहीं रहता, तो कभी जरूरी काम या किसी से हुई बातचीत दिमाग से निकल जाती है। ज़्यादातर लोग इसे सामान्य मानकर नजरअंदाज कर देते हैं, लेकिन जब यह समस्या बार-बार होने लगे तो चिंता होना स्वाभाविक है। खासकर तब जब व्यक्ति खुद को पहले जैसा न महसूस करे और उसे लगे कि उसकी याददाश्त या समझ में बदलाव आ रहा है। ऐसे में मन में यह सवाल उठता है कि कहीं यह सिर्फ दिमागी थकान और तनाव का असर तो नहीं या फिर डिमेंशिया (Dementia) जैसी गंभीर मानसिक समस्या की शुरुआत तो नहीं है।
Dementia क्या है ?
दरअसल डिमेंशिया (Dementia) एक ऐसी स्थिति है जिसमें याददाश्त के साथ-साथ सोचने और समझने की क्षमता भी प्रभावित होने लगती है। सही जानकारी न होने के कारण लोग अक्सर भ्रम में पड़ जाते हैं और डरने लगते हैं। इसलिए यह समझना जरूरी है कि मानसिक थकान और डिमेंशिया के बीच क्या फर्क होता है ताकि सही समय पर स्थिति को पहचाना जा सके।
विशेषज्ञों के मुताबिक दिमागी थकान और डिमेंशिया (Dementia) दोनों में भूलने की समस्या दिख सकती है लेकिन इनका असर अलग-अलग होता है। दिमागी थकान में व्यक्ति कभी-कभी ही चीजें भूलता है और थोड़ी देर सोचने पर उसे याद भी आ जाती हैं। ऐसे लोग अपने रोजमर्रा के काम सामान्य रूप से कर पाते हैं और बातचीत में भी कोई बड़ी परेशानी नहीं होती।
वहीं डिमेंशिया (Dementia) में भूलने की समस्या धीरे-धीरे बढ़ती जाती है। व्यक्ति सिर्फ बातें ही नहीं बल्कि नाम, रास्ते और समय को लेकर भी उलझन महसूस करने लगता है। कई बार उसे परिचित लोगों को पहचानने में भी दिक्कत होती है। इसके साथ ही सोचने और फैसले लेने की क्षमता भी प्रभावित होने लगती है। यही वजह है कि दोनों के बीच फर्क समझना बेहद जरूरी होता है।
याददाश्त मजबूत रखने में लाइफस्टाइल का रोल
आपको बताते चलें कि, याददाश्त को बेहतर बनाए रखने के लिए रोजमर्रा की आदतों पर ध्यान देना जरूरी है। समय पर पूरी नींद लेना, संतुलित भोजन करना और पर्याप्त पानी पीना शरीर और दिमाग दोनों के लिए मददगार होता है। दिमाग को एक्टिव रखने के लिए पढ़ना, लिखना, पहेलियां हल करना या नई चीजें सीखना फायदेमंद माना जाता है।
इसके अलावा रोज थोड़ा समय शारीरिक एक्टिविटी और खुद के लिए निकालना भी जरूरी है। काम के बीच-बीच में आराम लेना और मोबाइल या स्क्रीन से दूरी बनाना दिमाग को राहत देता है। छोटी-छोटी बातों को नोट करने की आदत भी याददाश्त को संभालने में मदद कर सकती है। जिससे Dementia का खतरा कम रहता है।
कब जरूरी हो जाता है डॉक्टर से सलाह लेना?
अगर भूलने की समस्या लगातार बढ़ रही हो और रोजमर्रा की जिंदगी को प्रभावित करने लगे तो डॉक्टर से सलाह लेना जरूरी हो जाता है। जब व्यक्ति बार-बार एक ही बात पूछने लगे, परिचित जगहों पर रास्ता भटक जाए या बातचीत में बार-बार उलझन महसूस करे तो इसे नजरअंदाज नहीं करना चाहिए।
इसके अलावा व्यवहार में अचानक बदलाव या फैसले लेने में कठिनाई भी संकेत हो सकते हैं। समय पर डॉक्टर को दिखाने से सही सलाह और जरूरी जांच मिल सकती है जिससे स्थिति को बेहतर तरीके से संभाला जा सकता है और Dementia का खतरा काम रहता है।
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