साइटेशन में सुप्रीम कोर्ट के जजों के नाम लिखना सही नहीं, इलाहाबाद High Court की सख्त टिप्पणी
Sandesh Wahak Digital Desk: इलाहाबाद हाईकोर्ट (High Court) ने ट्रायल कोर्ट के जज द्वारा साइटेशन में सुप्रीम कोर्ट के जजों के नाम लिखने को सही नहीं माना है और इस प्रथा की निंदा की है। कोर्ट ने स्पष्ट कहा है कि यह न्यायिक अधिकारियों के लिए उचित नहीं है और भविष्य में ऐसी गलती न दोहराने की नसीहत दी है। साथ ही आदेश की प्रति सभी जिला जजों को भेजते हुए 18 फरवरी तक अनुपालन रिपोर्ट मांगी गई है।
याचिका खारिज करते हुए High Court ने की टिप्पणी
न्यायमूर्ति समित गोपाल की एकलपीठ ने प्रियांक कुमार की याचिका खारिज करते हुए यह टिप्पणी की है। प्रियांक कुमार बनाम उत्तर प्रदेश राज्य और अन्य मामले में अधीनस्थ अदालत के आदेश की समीक्षा करते हुए कोर्ट ने कहा कि आदेश के अंतिम पैराग्राफ से स्पष्ट होता है कि पुनरीक्षण अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के जजों के नामों का उल्लेख किया था जिन्होंने मामले का फैसला किया था।
कोर्ट (High Court) ने कहा कि आदेश में केवल केस नंबर, पार्टी का नाम, फैसले की तारीख और जिस टेक्स्ट पर भरोसा किया गया है उसका उल्लेख होना चाहिए, जजों के नामों का नहीं। कोर्ट ने यह भी कहा कि पहले भी इस तरह के मामलों में निर्देश दिए जा चुके हैं और रजिस्ट्रार जनरल ने सभी जिला और सत्र जजों को इस बारे में सूचित किया था, लेकिन संबंधित पुनरीक्षण अदालत ने इसे अनदेखा किया।
आदेश और प्रशासनिक कार्रवाई का जिक्र
यहां कोर्ट (High Court) ने आठ जनवरी 2026 के अपने आदेश का भी उल्लेख किया जिसमें रजिस्ट्रार क्रिमिनल को स्टाम्प रिपोर्टर से स्पष्टीकरण मांगने के निर्देश दिए गए थे। कोर्ट ने पाया था कि पहले से ही अंडरलाइन दस्तावेज पर हस्तलिखित नोट्स के साथ पिटीशन दायर की गई थी और स्टाम्प रिपोर्टर ने कोई आपत्ति नहीं उठाई थी।
दरअसल रजिस्ट्रार क्रिमिनल की रिपोर्ट में बताया गया कि फनेंद्र पाल सिंह, रिव्यू ऑफिसर ने पिटीशन की रिपोर्ट की थी और हस्तलिखित नोट्स को नहीं देख सके थे। अनजाने में हुई गलती के लिए उन्होंने बिना शर्त माफी मांगी और भविष्य में अधिक सावधानी बरतने का आश्वासन दिया।
कोर्ट की सख्त नाराजगी और चेतावनी
यहां कोर्ट (High Court) ने कहा कि दस्तावेजों की साफ और सुव्यवस्थित प्रतियां अदालत में प्रस्तुत की जानी चाहिए। कोर्ट ने यह भी कहा कि संबंधित रिव्यू ऑफिसर का यह जवाब कि गलती अनजाने में हुई है, अपर्याप्त है। रजिस्ट्रार क्रिमिनल को संबंधित रिव्यू ऑफिसर को चेतावनी देने के लिए निर्देशित किया गया है।
क्या था पूरा विवाद?
वहीं मामले से जुड़े तथ्यों के अनुसार याची प्रियांक कुमार ने अपने रिश्तेदारों पर सरकारी नौकरी दिलाने के बहाने पैसे ठगने का आरोप लगाया था। पुलिस द्वारा शिकायत पर एफआईआर दर्ज न करने पर उन्होंने सीआरपीसी की धारा 156(3) के तहत आवेदन दिया था। इस पर कोर्ट ने आरोपित भुवनेश और पांच अन्य को समन किया था।
आरोपितों की अर्जी पर हाईकोर्ट ने मामला ट्रायल कोर्ट को नए सिरे से सुनवाई के लिए भेज दिया था। पहले सीजेएम कोर्ट और फिर सत्र अदालत ने धारा 203 सीआरपीसी के तहत अर्जी खारिज कर दी थी। इन्हीं आदेशों को अनुच्छेद 227 के तहत हाईकोर्ट में चुनौती दी गई थी।
High Court का अंतिम निष्कर्ष
वहीं हाईकोर्ट (High Court) ने पुनरीक्षण कोर्ट के निर्णय को सही पाया। राज्य के वकील और प्रतिवादियों के वकील ने आरोपों को झूठा बताते हुए कहा कि शिकायतकर्ता का आरोपियों के साथ निजी विवाद है। उन्होंने कहा कि कोई समझौता नहीं हुआ था और चार लाख रुपये दिए जाने का कोई सबूत नहीं है।
कोर्ट ने आदेश दिया कि संबंधित पीठासीन अधिकारी को इस आदेश की जानकारी दी जाए और भविष्य में ऐसी गलती न करने के लिए कहा जाए। रजिस्ट्रार अनुपालन को निर्देश दिया गया है कि वह इस आदेश को एक सप्ताह के भीतर संबंधित जिला और सत्र न्यायाधीशों को भेजें ताकि इसे संबंधित पीठासीन अधिकारी तक पहुंचाया जा सके और भविष्य में सावधानी बरती जा सके।
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