Kanpur News: कार्बाइड पटाखों से छिन रही आंखों की रोशनी
Kanpur News: कानपुर की दीपावली इस बार खुशियों से ज्यादा दर्द और डर की कहानी बन गई है। शहर के अस्पतालों में कार्बाइड पटाखों से झुलसे और घायल मरीजों की संख्या लगातार बढ़ रही है। सबसे चिंताजनक बात यह है कि अब तक 12 मरीज अपनी एक आंख की रौशनी हमेशा के लिए खो चुके हैं।
75 का इलाज 12 नए मरीज
यहां हैलट अस्पताल के प्लास्टिक सर्जरी और नेत्र रोग विभाग में शनिवार को ही 12 नए मरीज पहुंचे। इसके अलावा निजी अस्पतालों और क्लीनिकों में भी कई पीड़ित इलाज कराने पहुंचे। डॉक्टरों के मुताबिक, कार्बाइड पटाखों से जलने वाले जख्म आम पटाखों से कहीं ज्यादा खतरनाक होते हैं। इनके पाउडर के कण त्वचा और ऊतकों की गहराई में जम जाते हैं, जिससे घाव भरना बेहद मुश्किल हो जाता है।
हैलट के नेत्र रोग विभाग में अब तक 75 मरीजों का इलाज किया जा चुका है, जिनमें 8 मरीजों की एक आंख की रौशनी पूरी तरह चली गई है। वहीं, निजी डॉक्टरों के पास आए 4 और मरीजों की आंखें भी इन पटाखों की बलि बन गईं। वहीं लाला लाजपत राय अस्पताल की वरिष्ठ नेत्र रोग विशेषज्ञ डॉ. शालिनी मोहन का कहना है कि कार्बाइड से आंख की परतें और कॉर्निया बुरी तरह जल जाते हैं। उन्होंने कहा, कार्बाइड के पटाखे खतरनाक रासायनिक प्रतिक्रिया करते हैं। यह न सिर्फ जलाते हैं बल्कि आंख की गहराई तक नुकसान पहुंचाते हैं। ऐसे पटाखों को तुरंत प्रतिबंधित किया जाना चाहिए।

बारूद बनाम कार्बाइड
जीएसवीएम मेडिकल कॉलेज के प्लास्टिक सर्जन डॉ. प्रेम शंकर के अनुसार, कार्बाइड पटाखों के घाव बारूद वाले पटाखों से कहीं ज्यादा गहरे होते हैं। उन्होंने बताया कि बारूद वाले पटाखों से मांस फटता है, लेकिन कार्बाइड से ऊतक गल जाते हैं। जख्मों में पाउडर भर जाने से संक्रमण बढ़ता है और घाव भरने में कई हफ्ते लग जाते हैं।
वहीं डॉ. परवेज़ खान, विभागाध्यक्ष, नेत्र रोग, ने बताया कि ऐसे मामलों में अक्सर कॉर्निया की परत पूरी तरह फट जाती है। साथ ही डॉ. मलय चतुर्वेदी का कहना है कि कार्बाइड के कण एल्केलाइन इंजरी करते हैं। यदि समय रहते इलाज न मिले तो यह 360 डिग्री तक आंख की पूरी संरचना को नुकसान पहुंचा सकते हैं।
वहीं कानपुर में इस बार की दीपावली ने साफ कर दिया है कि कार्बाइड पटाखों का चलन आंखों की रौशनी तक छीन सकता है। विशेषज्ञों का कहना है कि प्रशासन को तुरंत इन पटाखों पर सख्त कार्रवाई करनी चाहिए, ताकि अगली दीपावली में कोई भी परिवार अपनी खुशियां इस तरह के दर्द में न गंवाए।
Also Read: बेटियों को आत्मनिर्भर बनाना चाहते हैं 55 फीसदी मुस्लिम समाज के अभिभावक

