जानें कब कराना चाहिए CRP टेस्ट, शरीर के इंफेक्शन और सूजन का है भरोसेमंद संकेतक

Sandesh Wahak Digital Desk: जब शरीर में कोई इंफेक्शन या सूजन होती है, तो हमारी प्रतिरोधक प्रणाली (इम्यून सिस्टम) उसे पहचानने और उससे लड़ने के लिए सक्रिय हो जाती है। इसी प्रक्रिया में लीवर एक विशेष प्रोटीन बनाता है जिसे सी-रिएक्टिव प्रोटीन (C-Reactive Protein) या सीआरपी (CRP) कहा जाता है। यह प्रोटीन शरीर की अंदरूनी स्थिति का संकेतक है, जब इसका स्तर बढ़ा हुआ मिलता है, तो समझिए शरीर में कहीं न कहीं इंफेक्शन या सूजन चल रही है। यही कारण है कि डॉक्टर अक्सर किसी भी अज्ञात बुखार या सूजन की जांच के लिए सीआरपी टेस्ट की सलाह देते हैं।

क्या है सीआरपी टेस्ट?

सीआरपी टेस्ट एक सामान्य ब्लड टेस्ट है जो खून में मौजूद इस प्रोटीन की मात्रा को मापता है। मेयो क्लिनिक के अनुसार, जब शरीर में किसी प्रकार की चोट, इंफेक्शन या सूजन होती है, तो लीवर तुरंत सीआरपी का स्तर बढ़ा देता है ताकि शरीर को खतरे से बचाया जा सके। सामान्य परिस्थितियों में खून में इसकी मात्रा बेहद कम होती है, लेकिन जैसे ही कोई इंफ्लेमेशन होता है, यह स्तर तेजी से ऊपर चला जाता है। अगर रिपोर्ट में सीआरपी का स्तर सामान्य से ज्यादा आता है, तो यह संकेत देता है कि शरीर में कहीं सूजन या संक्रमण मौजूद है, चाहे वह आंतरिक हो या बाहरी।

किन बीमारियों का पता बताता है सीआरपी टेस्ट?

दरसल सीआरपी टेस्ट केवल इंफेक्शन की पहचान ही नहीं करता, बल्कि कई गंभीर बीमारियों के बारे में भी शुरुआती संकेत देता है। जिनमें गंभीर संक्रमण (सेप्सिस) जब शरीर में किसी तरह का गंभीर संक्रमण फैल जाता है, तो सीआरपी का स्तर तेजी से बढ़ता है, ऑटोइम्यून बीमारियां, जैसे- रूमेटॉइड आर्थराइटिस और ल्यूपस, इन बीमारियों में शरीर अपनी ही कोशिकाओं पर हमला करता है, जिससे सूजन होती है। ऐसे मामलों में सीआरपी का स्तर बीमारी की सक्रियता को दिखाता है। आंतों की सूजन, जैसे- क्रोहन डिजीज या अल्सरेटिव कोलाइटिस जैसी बीमारियों में भी सीआरपी स्तर बढ़ा पाया जाता है। दिल की बीमारियां, इसके एक विशेष रूप, एचएस-सीआरपी (High Sensitivity CRP) टेस्ट से हार्ट की सेहत का आकलन किया जाता है। अगर यह स्तर लंबे समय तक बढ़ा रहे, तो यह हार्ट की ब्लड वेसेल्स में सूजन और भविष्य में हार्ट अटैक के खतरे का संकेत दे सकता है।

कब और किस उम्र में करवाएं यह टेस्ट?

दरसअल सामान्य व्यक्ति को यह टेस्ट बार-बार कराने की जरूरत नहीं होती। लेकिन अगर शरीर में बार-बार इंफेक्शन, लगातार बुखार, थकान, जोड़ों में दर्द, या किसी गंभीर बीमारी के लक्षण नजर आएं, तो डॉक्टर इसे करवाने की सलाह दे सकते हैं।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार आज के समय में बढ़ते हृदय रोग के मामलों को देखते हुए, 30 से 40 साल की उम्र के बाद हर व्यक्ति को समय-समय पर एचएस-सीआरपी टेस्ट जरूर करवाना चाहिए। खासकर उन लोगों को जिनके परिवार में हार्ट डिजीज का इतिहास रहा है।

 

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