लोध बनाम कुर्मी: यूपी बीजेपी में छिड़ी ‘अपनों’ की जंग, क्या 2027 की हैट्रिक में रोड़ा बनेगी जातीय राजनीति?
Sandesh Wahak Digital Desk: उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक पुराना मुहावरा है “दिल्ली का रास्ता लखनऊ से होकर गुजरता है और लखनऊ का रास्ता जातियों की गलियों से।” आज भारतीय जनता पार्टी, इसी गलियारे में एक नई और मुश्किल चुनौती का सामना कर रही है। राज्य के दो कद्दावर ओबीसी समुदायों लोध और कुर्मी के बीच बढ़ती सियासी तल्खी ने बीजेपी आलाकमान की नींद उड़ा दी है। यह लड़ाई अब सिर्फ दो नेताओं की नहीं, बल्कि दो बड़े वोटबैंकों के ‘अस्तित्व और सम्मान’ की लड़ाई में तब्दील हो गई है।
एक मंत्री, एक विधायक और महोबा की सड़क
इस सियासी संग्राम की शुरुआत 30 जनवरी को बुंदेलखंड के महोबा में हुई। योगी सरकार के ताकतवर जलशक्ति मंत्री स्वतंत्र देव सिंह (कुर्मी समाज) एक कार्यक्रम में जा रहे थे। तभी चरखारी से बीजेपी विधायक बृजभूषण सिंह राजपूत (लोध समाज) ने करीब 50 ग्राम प्रधानों के साथ उनका रास्ता रोक लिया।
विधायक का आरोप था कि ‘जल जीवन मिशन’ के नाम पर जनता को ठगा जा रहा है न पाइपलाइन ठीक है, न पानी मिल रहा है और न टंकियां बनी हैं। सड़क पर ही मंत्री और विधायक के बीच तीखी नोकझोंक हुई। समर्थकों और पुलिस के बीच झड़प हुई और देखते ही देखते यह प्रशासनिक मुद्दा ‘जातीय अस्मिता’ का मुद्दा बन गया।
लोध समाज का शक्ति प्रदर्शन
विधायक बृजभूषण राजपूत को जब पार्टी ने ‘कारण बताओ नोटिस’ जारी किया, तो लोध समाज इसे अपने अपमान के तौर पर देखने लगा। रविवार को राजधानी लखनऊ में हुआ लोधी समाज का महासम्मेलन इसी नाराजगी का नतीजा था। इस सम्मेलन में केंद्रीय मंत्री बीएल वर्मा और यूपी के कैबिनेट मंत्री धर्मपाल सिंह जैसे दिग्गजों की मौजूदगी ने साफ कर दिया कि मामला अब सिर्फ एक विधायक तक सीमित नहीं है।
लोध समाज, जो पूर्व मुख्यमंत्री स्वर्गीय कल्याण सिंह के दौर से बीजेपी का सबसे वफादार ‘कोर वोटबैंक’ रहा है, अब खुद को उपेक्षित महसूस कर रहा है। उनकी नाराजगी इस बात को लेकर भी है कि प्रदेश अध्यक्ष के पद के लिए लोध नेताओं के नाम चर्चा में थे, लेकिन पार्टी ने कुर्मी समाज से आने वाले पंकज चौधरी को अध्यक्ष बना दिया।
बीजेपी का ‘सोशल इंजीनियरिंग’ चक्रव्यूह
बीजेपी के लिए यह स्थिति ‘उगलें तो तीखा, निगलें तो कड़वा’ जैसी है। पार्टी के सामने दो मजबूत स्तंभ हैं।
कुर्मी समाज (बीजेपी की नई ताकत): यादवों के बाद ओबीसी में सबसे बड़ी आबादी कुर्मियों की है। मिर्जापुर, बरेली, उन्नाव और बस्ती जैसे 16 जिलों में इनका 10 से 15 फीसदी वोट बैंक है। 2014 के बाद से यह समाज बीजेपी की जीत का बड़ा आधार रहा है।
लोध समाज (बीजेपी का पुराना किला): बुलंदशहर, अलीगढ़, पीलीभीत और झांसी जैसे दर्जनों जिलों में लोध वोटर निर्णायक भूमिका में हैं। ये नब्बे के दशक से बीजेपी के साथ मजबूती से खड़े हैं।
2024 के जख्म और 2027 की चुनौती
2024 के लोकसभा चुनावों ने पहले ही बीजेपी को चेतावनी दे दी है। समाजवादी पार्टी की ‘पीडीए’ (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) रणनीति ने बीजेपी के इस मजबूत जातीय किले में सेंध लगा दी है। आंकड़े बताते हैं कि 2024 में कुर्मी और लोध वोटरों का एक हिस्सा सपा की तरफ खिसका है।
अब अगर स्वतंत्र देव सिंह बनाम बृजभूषण राजपूत की यह जंग कुर्मी बनाम लोध में बदलती है, तो इसका सीधा नुकसान बीजेपी को 2027 के विधानसभा चुनाव में होगा। एक समाज को खुश करने की कोशिश दूसरे को नाराज कर सकती है।
अनुशासन या समझौता?
बृजभूषण राजपूत के पिता और पूर्व सांसद गंगा चरण राजपूत ने खुलकर अपने बेटे का बचाव किया है। उन्होंने इसे बुंदेलखंड के पानी की लड़ाई बताया है। वहीं, पार्टी संगठन अनुशासन की दुहाई दे रहा है। लेकिन सवाल यह है कि क्या बीजेपी अपने सबसे पुराने और वफादार वोटबैंक (लोध) को नाराज करने का जोखिम उठा सकती है? या फिर जलशक्ति मंत्री की साख बचाने के लिए विधायक पर कार्रवाई करेगी?
उत्तर प्रदेश में बीजेपी की ‘सबका साथ-सबका विकास’ की नीति फिलहाल आंतरिक ‘कास्ट पॉलिटिक्स’ के दबाव में है। लोध बनाम कुर्मी की यह लड़ाई यदि जल्द नहीं थमी, तो विपक्षी दल इसका पूरा फायदा उठाने के लिए तैयार बैठे हैं। 2027 की चुनावी डगर पर सत्ता की हैट्रिक लगाने के लिए बीजेपी को विकास के साथ-साथ इन जातीय दरारों को भी बहुत सावधानी से भरना होगा।

