Lohri Celebration: लखनऊ की गलियों में गूंजे ‘दुल्ला भट्टी’ के गीत, नई फसल और खुशहाली का जश्न

Sandesh Wahak Digital Desk: भारत अपनी विविध संस्कृतियों के लिए जाना जाता है, और लोहड़ी का पर्व इसी सांस्कृतिक विरासत की एक खूबसूरत झलक पेश करता है। हर साल 13 जनवरी को मनाया जाने वाला यह त्योहार सर्द रातों की विदाई और रबी की फसलों के पकने की खुशी का प्रतीक है। लखनऊ के रामजीलाल सरदार पटेल नगर वार्ड की समर विहार कॉलोनी में भी आज लोहड़ी का पर्व पूरी श्रद्धा और धूमधाम से मनाया गया।

क्यों खास है लोहड़ी?

लोहड़ी सिर्फ एक त्योहार नहीं, बल्कि प्रकृति और किसान की मेहनत के प्रति आभार व्यक्त करने का तरीका है। इसका ऐतिहासिक संबंध लोकनायक दुल्ला भट्टी से भी है, जिन्होंने मुगल काल में गरीबों और बेटियों की रक्षा की थी। यही कारण है कि आज भी अलाव के चारों ओर घूमते हुए लोग पारंपरिक गीतों में उनका नाम बड़े आदर से लेते हैं।

शाम होते ही मोहल्लों में लकड़ियों का ढेर (अलाव) सजाया गया। लोगों ने अग्नि देव की पूजा की और उसमें तिल, गुड़, मूंगफली, रेवड़ी और मक्का अर्पित कर सुख-समृद्धि की कामना की। समर विहार कॉलोनी में आयोजित इस उत्सव में हर धर्म के लोग शामिल हुए, जो आपसी भाईचारे की एक मिसाल है।

नई शुरुआत और खुशियां

लोहड़ी उन परिवारों के लिए और भी खास होती है जहां हाल ही में शादी हुई हो या किसी बच्चे का जन्म हुआ हो। लखनऊ के इस कार्यक्रम में भी विशेष रौनक रही। सौरव व प्रेरणा धवन और विनीत सिंह व रूही सलूजा के लिए यह पहली लोहड़ी बेहद यादगार रही। ऋषि और आशिमा भाटिया के पुत्र ‘फतेह भाटिया’ की पहली लोहड़ी पर पूरे परिवार ने जमकर खुशियां मनाईं।

शांति और एकता का संदेश

लोहड़ी की यह पावन अग्नि हमें सिखाती है कि हम अपने सारे पुराने गिले-शिकवे जलाकर एक नई और सकारात्मक शुरुआत करें। मक्के की रोटी, सरसों के साग और ढोल की थाप के बीच यह पर्व समाज को एकता के सूत्र में पिरोने का काम कर रहा है।

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