वंदे मातरम् की अनिवार्यता पर बोले मौलाना अरशद मदनी, मुसलमान सिर्फ अल्लाह की इबादत करता है
Sandesh Wahak Digital Desk: केंद्र सरकार द्वारा राष्ट्र गीत वंदे मातरम् को लेकर जारी किए गए नए प्रोटोकॉल पर सियासी और धार्मिक सरगर्मियां तेज हो गई हैं। जमीयत उलेमा-ए-हिंद के अध्यक्ष मौलाना अरशद मदनी ने इस फैसले को पक्षपाती बताते हुए कहा कि यह अल्पसंख्यकों की धार्मिक आजादी पर सीधा हमला है।
मौलाना मदनी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘X’ पर अपनी नाराजगी जाहिर करते हुए तर्क दिया कि मुसलमान किसी को यह गीत गाने से नहीं रोकते, लेकिन उन्हें इसे गाने के लिए मजबूर करना गलत है। उनके विरोध के मुख्य बिंदु ये हैं।
एकेश्वरवाद बनाम बहुदेववाद: मदनी के अनुसार, इस्लाम सिर्फ एक अल्लाह की इबादत की इजाजत देता है। वंदे मातरम् की कुछ पंक्तियां धरती को ईश्वर के रूप में प्रस्तुत करती हैं, जो मुस्लिम आस्था (एकेश्वरवाद) के खिलाफ है।
संविधान का हवाला: उन्होंने कहा कि यह आदेश संविधान की धारा 25 (धार्मिक स्वतंत्रता) और सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसलों का खुला उल्लंघन है।
राजनीतिक एजेंडा: मदनी ने आरोप लगाया कि इसे अनिवार्य करना असल में ‘चुनावी राजनीति’ और ‘सांप्रदायिक एजेंडा’ का हिस्सा है, ताकि जनता का ध्यान असल मुद्दों से भटकाया जा सके।
देशभक्ति नारों से नहीं, बलिदान से तय होती है
मदनी ने स्पष्ट किया कि मातृभूमि से प्रेम करने के लिए किसी नारे की जरूरत नहीं है। उन्होंने कहा, मुसलमान सब कुछ बर्दाश्त कर सकता है, लेकिन अल्लाह के साथ किसी और को शरीक करना (साझा करना) कभी स्वीकार नहीं करेगा। उन्होंने आजादी की लड़ाई में मुसलमानों और जमीयत के संघर्षों को याद दिलाते हुए कहा कि चरित्र और बलिदान ही सच्ची देशभक्ति है।
देवबंदी उलेमा ने भी जताई असहमति
वहीं, देवबंदी उलेमा मौलाना कारी इसहाक गोरा ने भी सरकार के इस कदम की आलोचना की। उन्होंने कहा कि इस्लाम एक अनुशासन वाला धर्म है और इसमें अल्लाह के अलावा किसी और की पूजा नहीं की जाती। सरकार को इसे लागू करने से पहले यह सोचना चाहिए था कि क्या इसके शब्द किसी विशेष धर्म की भावनाओं को आहत तो नहीं कर रहे।
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