मिशन 2027: सपा की रणनीति, जमीनी सक्रियता होगी टिकट का पैमान

Sandesh Wahak Digital Desk/A.R.Usmani: समाजवादी पार्टी ने 2027 के विधानसभा चुनाव के लिए अभी से रणनीति बनानी शुरू कर दी है। पार्टी ने इस बार टिकट के दावेदारों के लिए साफ संदेश दिया है कि केवल बैनर-पोस्टर से काम नहीं चलेगा, बल्कि जमीनी सक्रियता टिकट का पैमाना होगी। पूर्वी यूपी में मुस्लिम और यादव वोट बैंक के साथ ही सपा ने अन्य पिछड़ा व दलित वोटों पर भी निगाहें टिका दी हैं। जातिगत जनगणना के नतीजों को देखते हुए जाति-आधारित टिकट वितरण की योजना भी बनाई जा रही है।

टिकट के दावेदारों के लिए अखिलेश का नया एक्शन प्लान

सपा सुप्रीमो अखिलेश यादव ने पार्टी कैडर को चेतावनी दी है कि 2027 की लड़ाई बेहद कठिन होने वाली है। उन्होंने कहा कि भाजपा की रणनीति का मुकाबला करने के लिए माइक्रो लेवल पर काम करना होगा और विरोधियों की चालों को सतर्कता से काटना होगा। सपा ने तय किया है कि विधानसभा टिकट उन्हीं को मिलेगा जो लगातार सक्रिय रहें। 2024 के लोकसभा चुनाव में अखिलेश यादव का पीडीए फार्मूला बड़ा हिट रहा।

टिकट वितरण से लेकर चुनावी प्रचार तक, सपा ने इस समीकरण पर पूरी ताकत झोंकी। नतीजा यह हुआ कि सपा 37 सीटों तक पहुंच गयी, जो पार्टी के लिए बड़ी राजनीतिक छलांग थी। हालांकि, सूबे में हुए उपचुनाव में यह फार्मूला पूरी तरह कामयाब नहीं हो पाया और पार्टी को सिर्फ दो सीटों से ही संतोष करना पड़ा। विश्लेषकों का मानना है कि लोकसभा चुनाव में विपक्षी एकजुटता और पीडीए समीकरण ने काम किया, लेकिन उपचुनाव में भाजपा का लोकल लेवल मैनेजमेंट भारी पड़ा। अगले विधानसभा चुनाव में अभी डेढ़ साल का समय है, लेकिन टिकट की चाह रखने वाले नेता अभी से मैदान में उतर गए हैं और खुद को सबसे मजबूत दावेदार बताने में जुटे हैं।

समय से पहले तय हो जाएंगे टिकट

वर्ष 2022 में सपा ने टिकट का ऐलान ऐन वक्त पर किया था, लेकिन इस बार पार्टी की रणनीति अलग है। आगामी विधानसभा चुनाव के मद्देनजर टिकट समय से पहले तय किए जाएंगे, जिससे प्रत्याशियों को प्रचार का पूरा वक्त मिलेगा और कार्यकर्ता ऊहापोह से बच सकेंगे। वहीं, राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि अगर सपा समय रहते उम्मीदवार तय कर लेती है और पीडीए वोट बैंक को लगातार सक्रिय रखती है, तो 2027 में पूर्वी यूपी ही नहीं, पूरे प्रदेश में उसका प्रदर्शन बेहतर हो सकता है।

जातिगत गणित पर पैनी नजर

केंद्र सरकार के जातिगत जनगणना कराने के फैसले के बाद सपा अपने टिकट वितरण में इसका सीधा इस्तेमाल करने की तैयारी कर रही है। पार्टी सूत्रों के मुताबिक, 2027 में उम्मीदवार तय करते वक्त उनकी जाति की जनसंख्या और स्थानीय प्रभाव का विशेष ध्यान रखा जाएगा। पूर्वी उत्तर प्रदेश में मुस्लिम-यादव वोट बैंक को एकजुट करने के साथ-साथ सपा अब दलित और अन्य पिछड़ा वोटों में भी सेंध लगाने की कोशिश में है। यही वजह है कि पार्टी के कार्यक्रमों में इन वर्गों की अधिक भागीदारी सुनिश्चित करने के निर्देश दिए गए हैं। इसके साथ ही ब्राह्मण वोटर पर भी समाजवादी पार्टी की नजर है।

जातीय समीकरण व विपक्षी एकजुटता देगी बीजेपी को टक्कर

राजनीतिक दृष्टि से देखें तो 2027 समाजवादी पार्टी के लिए चुनौती और अवसर दोनों लेकर आएगा। चुनौती इसलिए कि भाजपा की संगठनात्मक पकड़ और चुनावी मशीनरी बेहद मजबूत है। उपचुनाव में सपा को यहीं मात मिली। इसके अलावा स्थानीय स्तर पर भाजपा के माइक्रो मैनेजमेंट को तोडऩा, जातिगत धु्रवीकरण से बचना, बहुसंख्यक वोटों में सेंध लगाना और कांग्रेस गठबंधन में सीट बंटवारे को लेकर असंतोष से बचना समाजवादी पार्टी के सामने मुख्य बाधाएं हैं।  अवसर इसलिए कि लोकसभा में पीडीए फार्मूले से मिली सफलता ने यह साबित कर दिया है कि यदि जातीय समीकरण और विपक्षी एकजुटता बनी रही, तो भाजपा को कड़ी टक्कर दी जा सकती है।

गोंडा की सातों सीटों पर दावेदारों की भीड़

जिले की सदर विधानसभा सीट के साथ ही करनैलगंज, कटरा बाजार, तरबगंज, मेहनौन, मनकापुर सुरक्षित व गौरा विधानसभा सीटों पर टिकट के दावेदारों की लम्बी फेहरिस्त है। हालांकि, सपा सुप्रीमो ने पहले ही स्पष्ट कर दिया है कि क्षेत्र में जमीनी सक्रियता ही टिकट दिलाएगी। इसमें कोई सिफारिश काम नहीं आएगी। इसके अलावा जातीय समीकरण का भी खास ख्याल रखा जाएगा। जिले के उन लोगों की कुंडली तैयार की जा रही है जो लगातार क्षेत्र में जमीनी स्तर पर सक्रिय रहे हैं।

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