मनरेगा बजट तीन साल से स्थिर, संसदीय समिति ने सरकार से फंड बढ़ाने की सिफारिश की

Sandesh Wahak Digital Desk: संसद की ग्रामीण विकास और पंचायती राज विभाग से संबंधित स्थायी समिति ने महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा) के बजट आवंटन में लगातार तीसरे साल वृद्धि न होने पर गंभीर सवाल उठाए हैं। समिति ने कहा कि 2023-24 के संशोधित अनुमानों के बाद से इस योजना का आवंटन 86,000 करोड़ रुपये पर स्थिर है, जो कि इसकी जरूरतों के अनुरूप नहीं है।

लगातार तीन साल से स्थिर बजट

बजट दस्तावेजों के मुताबिक, 2023-24 में मनरेगा के लिए 86,000 करोड़ रुपये आवंटित किए गए थे, जबकि वास्तविक खर्च 89,153.71 करोड़ रुपये तक पहुंच गया। इसके बावजूद 2024-25 में आवंटन 86,000 करोड़ रुपये ही रखा गया और संशोधित अनुमान में भी कोई बदलाव नहीं किया गया। वर्ष 2025-26 के लिए भी यही राशि तय की गई है।

समिति की सख्त टिप्पणियां

सोमवार को संसद में पेश रिपोर्ट में समिति ने कहा कि मनरेगा का प्रभावी संचालन समय पर और पर्याप्त फंडिंग पर निर्भर करता है। यह योजना ग्रामीण गरीबों और वंचित वर्ग को रोजगार उपलब्ध कराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है, इसलिए समय पर राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को पर्याप्त धन जारी किया जाना जरूरी है। समिति ने यह भी कहा कि वह 2023-24 से धन आवंटन न बढ़ाने के औचित्य को समझने में असमर्थ है।

मांग-आधारित योजना, जरूरत के मुताबिक फंड बढ़ाने की सिफारिश

समिति ने याद दिलाया कि मनरेगा एक मांग-आधारित योजना है, इसलिए बजट आवंटन की समीक्षा वास्तविक जरूरतों को देखते हुए की जानी चाहिए। ग्रामीण विकास विभाग (DORD) ने समिति को बताया कि राज्यों को धन जारी करना निरंतर और मांग-आधारित प्रक्रिया है, और जरूरत पड़ने पर वित्त मंत्रालय से अतिरिक्त फंड की मांग की जाती है।

आवंटन बढ़ाने की सिफारिश दोहराई

समिति ने कहा कि केंद्र को जमीनी स्तर पर रोजगार की वास्तविक मांग को देखते हुए बजट में पर्याप्त प्रावधान करना चाहिए ताकि मनरेगा अपने लक्ष्यों को पूरी तरह से हासिल कर सके। इसके मद्देनजर, समिति ने आवंटन बढ़ाने की अपनी सिफारिश दोहराई है, ताकि ग्रामीण गरीबों के लिए यह योजना और अधिक प्रभावी हो सके।

संख्या पर नकारात्मक असर पड़ सकता

मनरेगा, 2005 में शुरू हुई एक प्रमुख सामाजिक सुरक्षा योजना है, जो ग्रामीण परिवारों को साल में 100 दिन का गारंटीड मजदूरी आधारित रोजगार उपलब्ध कराती है। समिति का मानना है कि बजट में ठहराव से इस योजना के प्रभाव और लाभार्थियों की संख्या पर नकारात्मक असर पड़ सकता है।

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