अब बिना चीड़-फाड़ इस तकनीक से होगा Cancer का इलाज
Sandesh Wahak Digital Desk: दुनियाभर में कैंसर (Cancer) से जुड़े मामले लगातार बढ़ रहे हैं। कैंसर (Cancer) का नाम सुनते ही लोग इलाज से डरने लगते हैं। सर्जरी और कीमोथेरेपी के दर्द के साथ लंबे इलाज की सोच मरीजों को मानसिक रूप से कमजोर कर देती है। हालांकि मेडिकल साइंस ने अब कैंसर के इलाज को काफी हद तक आसान बना दिया है। दिल्ली के इंद्रप्रस्थ अपोलो अस्पताल में डॉक्टरों ने बिना चीर फाड़ एक नई तकनीक से ब्रेस्ट कैंसर का सफल इलाज किया है, जिसे क्रायोएब्लेशन कहा जाता है।
बिना सर्जरी Breast Cancer का इलाज
दरअसल क्रायोएब्लेशन तकनीक की मदद से कैंसर को बेहद कम तापमान पर जमाकर नष्ट किया जाता है। इसकी सबसे खास बात यह है कि इसमें न तो मरीज को बेहोश करने की जरूरत पड़ती है और न ही लंबे समय तक अस्पताल में भर्ती रहना होता है। यह तकनीक उन मरीजों के लिए राहत लेकर आई है, जो किसी कारणवश सर्जरी के लिए फिट नहीं होते।
इंद्रप्रस्थ अपोलो अस्पताल में 77 वर्षीय एक बुजुर्ग महिला ब्रेस्ट कैंसर (Breast Cancer) की समस्या के साथ पहुंचीं। अधिक उम्र के साथ उन्हें दिल की गंभीर बीमारी भी थी, जिससे जनरल एनेस्थीसिया और सर्जरी उनके लिए जानलेवा साबित हो सकती थी। डॉक्टरों के सामने सबसे बड़ी चुनौती बिना जोखिम कैंसर (Cancer) का इलाज करना था। जांच में पता चला कि महिला के ब्रेस्ट में ट्यूमर का आकार करीब 1.5 सेंटीमीटर था।
मरीज की स्थिति को देखते हुए डॉक्टरों की टीम ने पारंपरिक सर्जरी के बजाय आधुनिक क्रायोएब्लेशन तकनीक अपनाने का फैसला किया। उत्तर भारत में इस तकनीक से ब्रेस्ट कैंसर (Breast Cancer) के इलाज का यह पहला सफल मामला माना जा रहा है, जिसने बुजुर्ग और गंभीर बीमारियों से जूझ रहे मरीजों के लिए इलाज का नया रास्ता खोल दिया है।
क्या है क्रायोएब्लेशन तकनीक?
अपोलो अस्पताल की लीड ब्रेस्ट इमेजिंग स्पेशलिस्ट डॉ. शैली शर्मा के अनुसार क्रायोएब्लेशन एक आधुनिक और आसान तकनीक है, जिसमें बिना बड़ी सर्जरी के कैंसर (Cancer) सेल्स को अत्यधिक ठंड के जरिए नष्ट किया जाता है। इस प्रक्रिया में अल्ट्रासाउंड या सीटी स्कैन की मदद से पहले ट्यूमर की सटीक स्थिति तय की जाती है।
इसके बाद ट्यूमर के बीच एक पतली खोखली सुई डाली जाती है, जिसे प्रोब कहा जाता है। इस प्रोब के जरिए लिक्विड नाइट्रोजन जैसी बेहद ठंडी गैस प्रवाहित की जाती है। यह तकनीक फ्रीज थॉ फ्रीज साइकिल पर काम करती है, जिसमें ट्यूमर को पहले जमाया जाता है, फिर थोड़ी देर सामान्य तापमान पर लाया जाता है और दोबारा जमाया जाता है। इस प्रक्रिया से लगभग माइनस 170 डिग्री सेल्सियस तक की ठंडक पैदा होती है। अत्यधिक ठंड के कारण कैंसर सेल्स टूट जाते हैं और वहीं नष्ट हो जाते हैं। इसके बाद शरीर का इम्यून सिस्टम खुद इन मृत कोशिकाओं को साफ कर देता है।
30 मिनट में इलाज और उसी दिन छुट्टी
डॉ. शैली शर्मा बताती हैं कि इस तकनीक की सबसे बड़ी खासियत यह है कि मरीज को अस्पताल में भर्ती रहने की जरूरत नहीं पड़ती। पूरी प्रक्रिया लोकल एनेस्थीसिया में की जाती है, जिसमें मरीज पूरी तरह होश में रहता है और उसे ज्यादा दर्द भी नहीं होता। इसमें टांके लगाने की आवश्यकता नहीं पड़ती और केवल एक बारीक कट से प्रोब डाली जाती है। पूरी प्रक्रिया लगभग 30 मिनट में पूरी हो जाती है और इलाज के कुछ घंटों बाद ही मरीज को अस्पताल से छुट्टी दे दी जाती है, जिससे शारीरिक और मानसिक तनाव दोनों कम होते हैं।
बुजुर्ग मरीजों के लिए नई उम्मीद
क्रायोएब्लेशन तकनीक उन मरीजों के लिए किसी वरदान से कम नहीं है, जो अधिक उम्र या अन्य गंभीर बीमारियों की वजह से Cancer की सर्जरी नहीं करा सकते। भारत में हर साल बड़ी संख्या में बुजुर्ग महिलाओं में ब्रेस्ट कैंसर के मामले सामने आते हैं, लेकिन कई मरीज सर्जरी के लिए फिट नहीं होते। ऐसे में यह तकनीक सुरक्षित और प्रभावी विकल्प बनकर उभरी है। यह सफलता दर्शाती है कि भारत में अब कैंसर के इलाज के लिए विश्वस्तरीय सुविधाएं उपलब्ध हैं और आने वाले समय में यह तकनीक कई जिंदगियों को बचाने में अहम भूमिका निभा सकती है।
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