‘Phule’ Movie Review: भावनाओं और ऐतिहासिक सच्चाई से भरपूर ‘फुले’, यहां जाने कैसी है फिल्म ?
‘Phule‘ Movie Review: प्रतीक गांधी और पत्रलेखा की मुख्य भूमिका वाली फिल्म ‘फुले’ सिनेमाघरों में रिलीज़ हो चुकी है और इसे दर्शकों से सराहना मिल रही है। महात्मा ज्योतिबा फुले और सावित्रीबाई फुले की प्रेरणादायक जीवन यात्रा पर आधारित इस फिल्म ने 19वीं सदी के भारत को सजीव रूप में प्रस्तुत किया है।
फिल्म की कहानी की शुरुआत

फिल्म की शुरुआत 1987 से होती है, जब पुणे प्लेग की चपेट में था। एक वृद्ध सावित्रीबाई, एक बच्चे को अपनी पीठ पर उठाकर शिविर में लाती हैं – यहीं से फिल्म अतीत की ओर जाती है और सावित्री और ज्योतिबा के संघर्षों की कहानी शुरू होती है। शिक्षा, जाति व्यवस्था, महिला सशक्तिकरण और सामाजिक कुरीतियों के खिलाफ इस जोड़ी की लड़ाई को भावनात्मक गहराई के साथ दर्शाया गया है।
अनंत महादेवन के निर्देशन में बनी ‘फुले’ की सबसे बड़ी ताकत इसका सशक्त लेखन और यथार्थपरक निर्देशन है। फिल्म में कोई अति नाटकीयता नहीं है, बल्कि एक शांत और ठोस प्रस्तुति है जो लंबे समय तक दर्शकों के साथ बनी रहती है। फिल्म में दो ही गाने हैं, लेकिन बैकग्राउंड स्कोर इतना प्रभावी है कि आंखें नम हो जाती हैं।
प्रतीक गांधी की भूमिका में गहराई गंभीरता

अभिनय की बात करें तो प्रतीक गांधी ने महात्मा फुले की भूमिका में गहराई और गंभीरता का बेजोड़ संतुलन दिखाया है। वहीं पत्रलेखा ने सावित्रीबाई के रूप में अद्भुत सशक्तता और करुणा का प्रदर्शन किया है। विनय पाठक, जॉय सेनगुप्ता और अन्य कलाकारों का अभिनय भी उल्लेखनीय है।
हालांकि फिल्म कुछ विवादों और सेंसरशिप की वजह से चर्चा में रही, लेकिन इसके बावजूद यह एक जरूरी और जागरूकता फैलाने वाली फिल्म है। यह न सिर्फ अतीत की बात करती है, बल्कि आज के समाज को भी सोचने पर मजबूर कर देती है।
रेटिंग: 3.5/5 स्टार
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