रिप्लेसमेंट, इंजेक्शन या कार्टिलेज चेंज, क्या है Knees की खराबी का सही इलाज?
Sandesh Wahak Digital Desk: अगर किसी व्यक्ति को लंबे समय से घुटनों (Knees) खराब होने की असली वजह में दर्द बना रहता है तो यह आर्थराइटिस या ऑस्टियोआर्थराइटिस की बीमारी का संकेत हो सकता है। इस बीमारी में कई बार दवाएं लंबे समय तक असर नहीं करती हैं। ऐसे में डॉक्टर मरीज को घुटना (Knees) खराब होने की असली वजह बदलवाने की सलाह देते हैं। हालांकि हर मरीज के लिए घुटने बदलवाना जरूरी नहीं होता है। कुछ मामलों में इंजेक्शन या कार्टिलेज ट्रीटमेंट से भी राहत मिल सकती है।
Knees खराब होने की असली वजह
सर गंगाराम हॉस्पिटल में आर्थोपेडिक सर्जरी विभाग के सह अध्यक्ष डॉ गगन चड्ढा बताते हैं कि हर मरीज की स्थिति अलग होती है। मरीज की समस्या किस स्तर की है इस पर इलाज तय किया जाता है। घुटनों (Knees) खराब होने की असली वजह के दर्द के मरीजों में दवाओं से लेकर टोटल नी रिप्लेसमेंट तक के विकल्प मौजूद होते हैं। अब रोबोटिक सर्जरी भी आ चुकी है जिससे कम समय में घुटने बदले जा सकते हैं।
डॉ गगन के अनुसार घुटनों के खराब होने का मुख्य कारण ऑस्टियोआर्थराइटिस की बीमारी होती है जो गठिया का ही एक प्रकार है। इसके अलावा उम्र के साथ कार्टिलेज का घिसना अधिक वजन से जोड़ों पर पड़ने वाला दबाव पुरानी चोट या फ्रैक्चर और कैल्शियम व विटामिन डी की कमी भी घुटनों (Knees) खराब होने की असली वजह को खराब करती है। यह समस्या घुटनों की हड्डियों के बीच मौजूद कार्टिलेज के घिसने से होती है।

ऐसे बच सकता है घुटना
अगर शुरुआती समय में Knees में हल्का दर्द होने पर ही मरीज डॉक्टर से मिल ले तो फिजियोथेरेपी नी स्ट्रेंथनिंग एक्सरसाइज और कैल्शियम व विटामिन डी सप्लीमेंट जैसी दवाओं से बीमारी को बढ़ने से रोका जा सकता है। अगर दर्द को नजरअंदाज किया जाए तो परेशानी बढ़ती जाती है और फिर इलाज के लिए इंजेक्शन या सर्जरी जैसे विकल्पों पर जाना पड़ता है।
कब असर करता है इंजेक्शन
डॉ गगन बताते हैं कि जब घुटनों (Knees) के जोड़ में मौजूद ग्रीस कम हो जाती है तो हायलूरोनिक एसिड इंजेक्शन लगाया जाता है। यह हड्डियों के बीच रगड़ को कम करता है और दर्द व अकड़न में राहत देता है। यह इंजेक्शन उन मरीजों के लिए कारगर होता है जिनका कार्टिलेज पूरी तरह खत्म नहीं हुआ होता है। एक इंजेक्शन का असर चार से छह महीने तक रहता है और जरूरत पड़ने पर दोबारा इंजेक्शन लगाया जा सकता है।
डॉ गगन के अनुसार पूरा कार्टिलेज बदलना संभव नहीं होता है बल्कि इसकी रिपेयर या ग्राफ्टिंग की जाती है। यह इलाज पचास साल से अधिक उम्र के लोगों में ज्यादा सफल नहीं होता है। यह युवा मरीजों और सीमित डैमेज में ही कारगर माना जाता है। अगर घुटने (Knees) का बड़ा हिस्सा खराब हो चुका हो तो कार्टिलेज ट्रीटमेंट से खास फायदा नहीं मिलता है।
कब जरूरी हो जाती है नी रिप्लेसमेंट सर्जरी
मैक्स हॉस्पिटल में ज्वाइंट रिप्लेसमेंट और आर्थोस्कोपी विभाग के डायरेक्टर डॉ अखिलेश यादव बताते हैं कि जब दवाओं और इंजेक्शन से भी मरीज को राहत नहीं मिलती है और कार्टिलेज पूरी तरह घिस चुका होता है तब नी रिप्लेसमेंट सर्जरी की सलाह दी जाती है। आज के समय में यह सर्जरी सुरक्षित मानी जाती है और कई सालों तक असरदार रहती है। अब यह सर्जरी कम समय में हो जाती है और कई मामलों में मरीज को उसी दिन अस्पताल से छुट्टी भी मिल जाती है।
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