सिद्धार्थनगर जेल बना आत्मबोध का केंद्र, अधीक्षक ने की बंदियों के जीवन परिवर्तन की कामना

Sandesh Wahak Digital Desk: जिला कारागार सिद्धार्थनगर ने सुरक्षा और अनुशासन के पारंपरिक दायरे से बाहर निकलकर मानवता और आत्म-सुधार की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम उठाया है। कारागार के ‘आत्मबोधन सदन’ (बैरक) में पवित्र शिवलिंग की भव्य स्थापना और प्राण-प्रतिष्ठा का धार्मिक अनुष्ठान अत्यंत श्रद्धा और दिव्यता के साथ संपन्न हुआ।

कारागार अधीक्षक सचिन वर्मा के कर-कमलों द्वारा यह महत्वपूर्ण अनुष्ठान संपन्न किया गया, जिन्होंने स्पष्ट किया कि जिला कारागार सिद्धार्थनगर अब केवल दंड का नहीं, बल्कि “आस्था, आत्मबोध, सुधार और मानवता का केंद्र” है।

अनुष्ठान और आध्यात्मिक वातावरण

शिवलिंग की स्थापना के लिए ‘आत्मबोधन सदन’ का चयन किया गया। यह वह बैरक है जहां बंदी प्रारंभिक रूप से ठहरते हैं और यहीं से उनके सुधारात्मक और आध्यात्मिक जीवन की नई यात्रा शुरू होती है।

सुबह से ही कारागार में अलौकिक वातावरण था। शंखनाद, ‘ओम नमः शिवाय’ के जाप, वैदिक ऋचाओं और भजन-कीर्तन की ध्वनि से पूरा परिसर मंदिर स्थल की तरह दिव्यता से ओत-प्रोत था। गणेश वंदना, रुद्राभिषेक, पंचामृत स्नान, दुग्ध-अभिषेक और पुष्पार्चन सहित समस्त विधि-विधानपूर्वक प्राण-प्रतिष्ठा संपन्न की गई। अधीक्षक सचिन वर्मा, जेलर मुकेश प्रकाश और डिप्टी जेलर अजीत चंद ने स्वयं अभिषेक कर समस्त बंदियों के मानसिक कल्याण, आत्मबल और जीवन परिवर्तन की कामना की।

अधीक्षक का सुधारात्मक दृष्टिकोण

अधीक्षक सचिन वर्मा ने इस स्थापना के पीछे के वास्तविक उद्देश्य को स्पष्ट किया। “शिवलिंग की यह स्थापना सिर्फ एक धार्मिक कार्यक्रम नहीं, बल्कि बंदियों के जीवन में सकारात्मक बदलाव का आधार बनेगी। यह स्थान बंदियों के लिए न केवल आश्रय स्थल, बल्कि आत्मचिंतन, शांति, सकारात्मकता और नए जीवन की प्रेरणा का केंद्र बन सके।” उन्होंने कहा कि ऐसे आध्यात्मिक कार्यक्रम बंदियों के हृदय में आशा, संवेदना और जीवन की नई दिशा का संचार करते हैं।

बंदियों की स्वैच्छिक सहभागिता

इस पूरे आयोजन में बंदी समुदाय ने अत्यंत अनुशासित और स्वैच्छिक रूप से सहभागिता निभाई। बंदियों ने सफाई व्यवस्था, सजावट, मंच निर्माण, जल संसाधन और भजन-कीर्तन की व्यवस्थाओं में सक्रिय योगदान दिया।

कई बंदियों ने बताया कि ऐसे धार्मिक और आध्यात्मिक कार्यक्रम उन्हें मन की शांति, तनाव-मुक्ति और भविष्य के प्रति नई उम्मीद प्रदान करते हैं। प्राण-प्रतिष्ठा के उपरांत सामूहिक आरती आयोजित हुई, जिसके बाद सभी ने प्रसाद ग्रहण किया, जहाँ सामूहिक सद्भाव, भाईचारा और आत्मीयता का अद्भुत दृश्य देखने को मिला।

मनोवैज्ञानिक और सामाजिक महत्व

यह आध्यात्मिक पहल मनोवैज्ञानिक और सामाजिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है। यह बंदियों के भीतर सकारात्मक विचारों का संचार करेगी, उनके तनाव, भ्रम और भय को कम करेगी, जिससे उनके मन में आत्मविश्वास और शांतिपूर्ण व्यवहार विकसित होगा। यह सुधार एवं पुनर्वास की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।

रिपोर्ट: जाकिर खान

 

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