SIPRI Report: सबसे अधिक हथियार खरीदने वाले टॉप 5 देशों में पाकिस्तान, 80% चीन से खरीद

Sandesh Wahak Digital Desk: स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट (SIPRI) की नई रिपोर्ट में वैश्विक हथियार व्यापार से जुड़ी कई अहम जानकारियां सामने आई हैं। साल 2026 के लिए जारी इस रिपोर्ट में 2025 के दौरान दुनियाभर में हुए हथियार सौदों पर फोकस किया गया है। रिपोर्ट के मुताबिक 2021–25 के बीच दुनिया के देशों के बीच बड़े हथियारों के व्यापार का वैश्विक वॉल्यूम पिछले पांच साल यानी 2016–20 के मुकाबले 9.2 प्रतिशत बढ़ गया है। यह बढ़ोतरी 2011–15 के बाद सबसे बड़ी छलांग मानी जा रही है।

सैन्य ताकत बढ़ाने में जुटा पाकिस्तान

SIPRI की रिपोर्ट के अनुसार पाकिस्तान लगातार अपनी परमाणु और पारंपरिक सैन्य क्षमताओं को बढ़ाने में लगा हुआ है और सेना के आधुनिकीकरण की प्रक्रिया जारी है। रिपोर्ट यह भी बताती है कि रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद यूरोप के देशों में भी सुरक्षा को लेकर चिंता बढ़ गई है। इसी वजह से यूरोपीय देशों ने हथियारों की खरीद में भारी इजाफा किया है। 2011–15 के मुकाबले 2021–25 के बीच यूरोप की हथियार खरीद में 210 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई है।

चीनी हथियारों पर बढ़ती पाकिस्तान की निर्भरता

SIPRI की रिपोर्ट में यह भी सामने आया है कि पाकिस्तान अब हथियारों के मामले में लगभग पूरी तरह चीन पर निर्भर हो चुका है। 2021–25 के दौरान पाकिस्तान के कुल हथियार आयात में चीन की हिस्सेदारी बढ़कर 80 प्रतिशत हो गई है, जबकि 2016–20 के बीच यह 73 प्रतिशत थी। इससे यह संकेत मिलता है कि पाकिस्तान तेजी से चीनी हथियारों की ओर झुक रहा है। इसका एक मतलब यह भी माना जा रहा है कि पाकिस्तान को अन्य देशों से हथियारों की आपूर्ति सीमित हो गई है।

हथियार खरीदने वाले देशों में पाकिस्तान टॉप-5 में

SIPRI के आंकड़ों के अनुसार 2016–20 की तुलना में 2021–25 के दौरान पाकिस्तान के हथियारों के आयात में 66 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है। इस बढ़ोतरी के साथ पाकिस्तान अब दुनिया के उन शीर्ष पांच देशों में शामिल हो गया है जो सबसे ज्यादा हथियार खरीदते हैं। इस सूची में यूक्रेन पहले स्थान पर है, जबकि भारत, सऊदी अरब और कतर इसके बाद आते हैं। चीन के बाद पाकिस्तान को हथियार देने वाले अन्य देशों में तुर्की की हिस्सेदारी 7 प्रतिशत और नीदरलैंड की हिस्सेदारी 4.6 प्रतिशत है।

रिपोर्ट में यह भी संकेत दिया गया है कि पाकिस्तान की चीनी हथियारों पर बढ़ती निर्भरता भारत के लिए रणनीतिक चुनौती बन सकती है। चीन और पाकिस्तान के बीच सैन्य सहयोग से दक्षिण एशिया के सैन्य संतुलन पर असर पड़ सकता है। उदाहरण के तौर पर पाकिस्तान चीन के जे-35 स्टील्थ फाइटर जेट खरीदने को लेकर बातचीत कर रहा है। इससे दोनों देशों के सैन्य संबंध और मजबूत हो सकते हैं।

लंबे समय तक लड़ाई जारी रखने की क्षमता

SIPRI की रिपोर्ट के अनुसार पाकिस्तान के हथियार आयात में 2021–25 के दौरान 66 प्रतिशत की वृद्धि हुई है और इसमें चीन की बड़ी भूमिका है। इसका अर्थ यह है कि युद्ध की स्थिति में पाकिस्तान और चीन की हथियार प्रणालियां जैसे फाइटर जेट, मिसाइल और रडार आपस में बेहतर तालमेल के साथ काम कर सकती हैं। ऐसे में भारत को भविष्य में दो सीमाओं पर एक जैसी तकनीक वाले विरोधियों से मुकाबले की तैयारी रखनी पड़ सकती है।

रिपोर्ट यह भी बताती है कि पाकिस्तान की सैन्य लॉजिस्टिक व्यवस्था अब काफी हद तक चीन पर निर्भर होती जा रही है। ऐसी स्थिति में दोनों देश भारत से जुड़े डेटा और सूचनाओं को अपने हथियार सिस्टम के साथ एकीकृत कर सकते हैं। युद्ध के समय चीन पाकिस्तान को लगातार हथियारों की आपूर्ति भी जारी रख सकता है, जिससे पाकिस्तान लंबी अवधि तक लड़ाई जारी रखने में सक्षम हो सकता है।

भारत के लिए कुछ रणनीतिक फायदे भी

हालांकि इस पूरी स्थिति में भारत के लिए कुछ सकारात्मक पहलू भी बताए गए हैं। भारत ने अपने हथियारों के स्रोतों में विविधता बढ़ा दी है। भारत ने रूसी हथियारों पर अपनी निर्भरता घटाकर 40 प्रतिशत तक कर दी है। इसके अलावा भारत फ्रांस से 29 प्रतिशत और इजरायल से 15 प्रतिशत हथियार खरीद रहा है। इसका मतलब यह है कि चीन और पाकिस्तान को भारत के अलग-अलग हथियार प्रणालियों को लेकर अलग-अलग रणनीति बनानी पड़ेगी।

चीन की हथियार खरीद में गिरावट

साउथ चायना मॉर्निंग पोस्ट ने SIPRI रिपोर्ट के हवाले से बताया है कि चीन की हथियार खरीद में 72 प्रतिशत की गिरावट आई है। इसके बावजूद रूस अभी भी चीन का सबसे बड़ा हथियार आपूर्तिकर्ता बना हुआ है। चीन जितने हथियार आयात करता है उनमें से 66 प्रतिशत रूस से आते हैं। हालांकि बीजिंग धीरे-धीरे रूसी हार्डवेयर को हटाकर अपनी तकनीक विकसित करने की दिशा में काम कर रहा है, जिसमें हेलीकॉप्टर और एयरक्राफ्ट इंजन जैसी तकनीक शामिल हैं।

क्या है SIPRI?

SIPRI यानी स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट एक स्वतंत्र अंतरराष्ट्रीय संस्था है जो हथियारों, युद्ध, सैन्य खर्च और शांति से जुड़े मुद्दों पर शोध और विश्लेषण करती है। यह संस्था दुनियाभर में हथियारों के व्यापार, सैन्य बजट और परमाणु हथियारों की स्थिति से जुड़ा डेटा और वार्षिक रिपोर्ट जारी करती है।

 

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