रिलीज़ हुई सनी देओल की Border 2, जानें कैसी है फिल्म
Sandesh Wahak Digital Desk: 29 साल पहले जिस फिल्म Border ने पूरे देश को भावुक कर दिया था, उसी विरासत को आगे बढ़ाने के लिए टी सीरीज, सनी देओल और उनकी पलटन एक बार फिर मैदान ए जंग में उतर चुकी है। Border 2 सिर्फ एक फिल्म नहीं, बल्कि हर हिंदुस्तानी की रगों में दौड़ने वाले उस जज्बे का विस्तार है, जिसे डायरेक्टर अनुराग सिंह ने बड़े सलीके और सम्मान के साथ परदे पर उतारा है। फिल्म की पहली ही फ्रेम से जब सनी देओल की एंट्री होती है, तो सिंगल स्क्रीन हो या मल्टीप्लेक्स, पूरा थिएटर सीटियों और तालियों से गूंज उठता है। सवाल यही है कि क्या Border 2 पुराने कल्ट क्लासिक जैसा जादू दोहराने में कामयाब रहती है या नहीं।
क्या है Border 2 की कहानी?
फिल्म की कहानी सीधे 1971 के उस ऐतिहासिक युद्ध में ले जाती है, जब पाकिस्तान के ऑपरेशन चंगेज खान का भारतीय सेना ने मुंहतोड़ जवाब दिया था। Border 2 केवल जमीन पर लड़ी गई जंग तक सीमित नहीं रहती, बल्कि बैटल ऑफ पुंछ, बैटल ऑफ बसंतर और समंदर में INS खुकरी की डिफेंस से जुड़ी अनकही वीरता को भी बड़े परदे पर उतारती है। लेफ्टिनेंट कर्नल फतेह सिंह कलेर के किरदार में सनी देओल अपनी 6 सिख रेजिमेंट के साथ दुश्मन के लिए काल बनकर सामने आते हैं। उनके साथ मेजर होशियार सिंह के रूप में वरुण धवन हैं और आसमान से आग बरसाते फ्लाइंग ऑफिसर निर्मलजीत सिंह सेखों की भूमिका में दिलजीत दोसांझ नजर आते हैं। समंदर की लहरों पर मोर्चा संभालते हैं लेफ्टिनेंट कमांडर एम एस रावत, जिनका किरदार अहान शेट्टी ने निभाया है। जल, थल और नभ के ये शूरवीर किस तरह दुश्मन के छक्के छुड़ाते हैं और अपनी जान की बाजी लगाकर तिरंगे की आन बचाते हैं, इसका रोमांच थिएटर में ही महसूस किया जा सकता है।

कैसा रहा निर्देशन?
दरअसल जब बात वतन की आती है, तो Border 2 सीधे दिल से बात करती है। यह फिल्म भीतर सोए उस देशभक्ति के जज्बे को झकझोर देती है, जो तिरंगे के नाम पर धड़कता है। स्क्रीन पर भारतीय सेना का पराक्रम जिस भव्यता के साथ दिखाया गया है, वह किसी को भी भावुक कर देता है। डायरेक्टर अनुराग सिंह ने 1971 की उस तपती मिट्टी और मोर्चे की आग को इस कदर जिंदा किया है कि दर्शक खुद को जंग के मैदान में खड़ा महसूस करता है। धूल, बारूद और बलिदान की गूंज हर सीन में महसूस होती है। फिल्म बार बार याद दिलाती है कि सरहद पर खड़ा जवान जब जान देता है, तभी देश चैन की नींद सो पाता है।
डायरेक्शन की पकड़
आपको बताते चलें कि Border 2 जैसी ऐतिहासिक फिल्म की विरासत को संभालना आसान नहीं था, लेकिन अनुराग सिंह ने इस जिम्मेदारी को बखूबी निभाया है। उन्होंने 1971 के युद्ध की आत्मा को आधुनिक सिनेमा की तकनीक और भव्यता के साथ इस तरह जोड़ा है कि हर पीढ़ी उससे जुड़ पाती है। जे पी दत्ता की परंपरा को आगे बढ़ाते हुए अनुराग ने वीरता, बलिदान और भाईचारे की कहानी को बिना किसी बनावट के पेश किया है। फिल्म के वॉर सीक्वेंस अंतरराष्ट्रीय स्तर की फिल्मों को टक्कर देते हैं। जमीन पर आमने सामने की लड़ाई हो या आसमान में लड़ाकू विमानों की गर्जना, हर फ्रेम में मेहनत साफ नजर आती है। एक्शन सिर्फ धमाकों तक सीमित नहीं है, बल्कि वह जवानों के दर्द और उनके जज्बे को भी बयान करता है। दमदार डायलॉग्स फिल्म की सबसे बड़ी ताकत बनकर उभरते हैं, जो सिनेमाघरों को तालियों और सीटियों से भर देते हैं।

कैसी रही एक्टिंग?
फिल्म की सबसे मजबूत कड़ी सनी देओल हैं, जो इस कहानी की धड़कन बनकर सामने आते हैं। इस बार वह सिर्फ दहाड़ते नहीं, बल्कि अपने अभिनय से हंसाते भी हैं और रुलाते भी हैं। फिल्म सनी देओल से शुरू होती है और उन्हीं पर खत्म होती है, जिससे उनका प्रभाव और गहरा हो जाता है। वरुण धवन इस फिल्म का सबसे बड़ा सरप्राइज साबित होते हैं। अपने किरदार में उन्होंने जो संजीदगी और आग दिखाई है, वह उनके आलोचकों को चुप कराने के लिए काफी है। दिलजीत दोसांझ फिल्म में सुकून का एहसास लेकर आते हैं और उनकी मौजूदगी हर सीन को खास बना देती है। अहान शेट्टी ने भी पहले से ज्यादा परिपक्व अभिनय किया है और अनुभवी कलाकारों के बीच अपनी पहचान बनाई है। मोना सिंह, मेधा राणा और सोनम बाजवा ने अपने सीमित लेकिन प्रभावी किरदारों से फिल्म को मजबूती दी है।
देखें या नहीं?
अगर आप यह सोच रहे हैं कि Border 2 देखनी चाहिए या नहीं, तो जवाब है बिल्कुल देखनी चाहिए। यह फिल्म सिर्फ एक सीक्वल नहीं है, बल्कि उस बलिदान की याद दिलाती है, जो देश के जवान हर दिन देते हैं। ‘गदर’ वाले सनी देओल के फैंस को उनका विंटेज अंदाज जरूर पसंद आएगा। फिल्म का संगीत, खासकर ‘घर कब आओगे’ का नया एहसास, आंखें नम कर देता है। भारतीय सिनेमा में पहली बार जमीन और आसमान की जंग को इतने बड़े और असली स्केल पर दिखाया गया है।
कुल मिलाकर Border 2 देशभक्ति का वो डोज है, जो हर हिंदुस्तानी के लिए जरूरी है। यह फिल्म मनोरंजन से कहीं आगे जाकर वतन के प्रति सम्मान और सेना के प्रति कृतज्ञता का एहसास कराती है। बड़े परदे पर लिखा गया यह शौर्य पत्र पूरे परिवार के साथ देखने लायक है। थिएटर जरूर जाइए।
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