UGC के नए नियमों पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, केंद्र सरकार से जवाब तलब

Sandesh Wahak Digital Desk: UGC के नए इक्विटी रूल्स को लेकर देशभर में चल रहे विवाद के बीच गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट में इस मामले की अहम सुनवाई हुई। चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया सूर्यकांत की अगुवाई वाली पीठ ने छात्रों के बीच कथित भेदभाव के खिलाफ दाखिल जनहित याचिका पर सुनवाई शुरू की और केंद्र सरकार से जवाब तलब किया। अदालत ने सॉलिसिटर जनरल से इस मुद्दे पर स्पष्ट रुख रखने और एक समिति गठित करने पर विचार करने को कहा।

UGC विनियमों की भाषा पर सवाल

सुनवाई के दौरान सीजेआई ने प्रथम दृष्टया टिप्पणी करते हुए कहा कि UGC विनियमन की भाषा अस्पष्ट प्रतीत होती है। उन्होंने कहा कि विशेषज्ञों द्वारा इसकी भाषा की समीक्षा और संशोधन की आवश्यकता है ताकि भविष्य में इसका दुरुपयोग न हो सके। अदालत ने साफ किया कि नियमों की मंशा और प्रभाव दोनों पर गंभीरता से विचार किया जाएगा।

वहीं वरिष्ठ अधिवक्ता इंदिरा जयसिंह ने अदालत को बताया कि वर्ष 2019 से एक याचिका लंबित है, जिसमें 2012 के विनियमों को चुनौती दी गई थी। उन्होंने कहा कि अब उन विनियमों को 2026 के नए नियमों से प्रतिस्थापित कर दिया गया है। इस पर मुख्य न्यायाधीश ने स्पष्ट किया कि 2012 के विनियमों की जांच के दायरे से अदालत इससे अधिक पीछे नहीं जा सकती।

समाज में भेदभाव की आशंका

सीजेआई ने सॉलिसिटर जनरल से कहा कि इस मामले की जांच के लिए कुछ प्रतिष्ठित व्यक्तियों की एक समिति गठित करने पर विचार किया जाए, ताकि समाज बिना किसी भेदभाव के एक साथ आगे बढ़ सके। अदालत ने यह भी संकेत दिया कि नियमों के सामाजिक प्रभाव को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

वहीं न्यायमूर्ति बागची ने सुनवाई के दौरान कहा कि संविधान का अनुच्छेद 15(4) राज्यों को अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लिए विशेष कानून बनाने का अधिकार देता है। हालांकि उन्होंने यह सवाल भी उठाया कि प्रगतिशील कानून में प्रतिगामी रुख क्यों अपनाया जाना चाहिए।

पृथक शिक्षा व्यवस्था पर चिंता

न्यायमूर्ति बागची ने चिंता जताते हुए कहा कि उन्हें उम्मीद है कि भारत अमेरिका जैसी उस स्थिति की ओर नहीं बढ़ेगा, जहां कभी अश्वेत और श्वेत बच्चों के लिए अलग-अलग स्कूल हुआ करते थे। इस पर मुख्य न्यायाधीश ने सहमति जताते हुए कहा कि इस तरह की स्थितियों का फायदा उठाया जा सकता है। सुनवाई के दौरान यह भी कहा गया कि कुछ राजनीतिक नेताओं के बयान सामने आए हैं, जिनमें सामान्य वर्ग के छात्रों से शुल्क लेने जैसी बातें कही गई हैं।

वहीं एक वकील ने अदालत को बताया कि यदि कोई छात्र सामान्य वर्ग से है और किसी कॉलेज में नया प्रवेश लेता है, जहां सीनियर छात्रों द्वारा रैगिंग की जाती है, तो उसके पास कोई प्रभावी उपचार उपलब्ध नहीं है। इस पर सीजेआई ने आश्चर्य जताते हुए पूछा कि क्या सामान्य वर्ग के छात्र इन नियमों के तहत कवर नहीं होते। वकील ने स्पष्ट रूप से कहा कि बिल्कुल नहीं।

नियम 3C और संविधान का टकराव

वहीं इस सुनवाई के दौरान वकीलों ने नियमों के सेक्शन 3C की परिभाषा को सीधे तौर पर चुनौती दी। वकील विष्णु शंकर जैन ने दलील दी कि यह प्रावधान जाति आधारित भेदभाव को बढ़ावा देता है और संविधान के अनुच्छेद 14 और 19 के खिलाफ है। उन्होंने कहा कि शिक्षा के क्षेत्र में इस तरह का भेदभाव समाज में खाई को और गहरा करेगा।

समानता के अधिकार पर सुप्रीम कोर्ट का रुख

सीजेआई ने कहा कि अदालत समानता के अधिकार के पहलू पर गंभीरता से विचार कर रही है और यह परखा जाएगा कि ये नियम संवैधानिक कसौटी पर खरे उतरते हैं या नहीं। जैन ने अदालत को बताया कि अनुच्छेद 14 में वर्गीकरण को लेकर स्पष्ट सिद्धांत मौजूद हैं और सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों में इसकी व्याख्या की जा चुकी है। उन्होंने दोहराया कि सेक्शन 3C अनुच्छेद 14 के बिल्कुल विपरीत है और इस जाति आधारित भेदभाव वाले प्रावधान पर रोक लगाने की मांग की।

वहीं सुनवाई के अंत में सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से औपचारिक जवाब मांगा और सॉलिसिटर जनरल से कहा कि वे UGC के इस मुद्दे पर समिति गठित करने के सुझाव पर विचार करें। अदालत ने संकेत दिया कि UGC के नए इक्विटी नियमों की संवैधानिक वैधता और सामाजिक प्रभाव दोनों की गहन समीक्षा की जाएगी।

 

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