हापुड़ में निलंबित लेखपाल की मौत, सीएम योगी ने दिए उच्चस्तरीय जांच के आदेश
Sandesh Wahak Digital Desk: उत्तर प्रदेश के हापुड़ में रिश्वत के आरोप में निलंबित किए गए लेखपाल सुभाष मीणा की गुरुवार तड़के इलाज के दौरान मौत हो गई। बताया जा रहा है कि उन्होंने बुधवार को तहसील परिसर में जहरीला पदार्थ खा लिया था, जिसके बाद उन्हें गंभीर हालत में गाजियाबाद के एक निजी अस्पताल में भर्ती कराया गया। हालांकि तमाम कोशिशों के बावजूद गुरुवार सुबह करीब 3:30 बजे उन्होंने दम तोड़ दिया।
इस घटना ने परिजनों, लेखपाल संघ और जिला प्रशासन में गहरी हलचल पैदा कर दी है। लेखपाल संघ का कहना है कि बिना गहराई से जांच किए सिर्फ एक शिकायत पर की गई कार्रवाई ने सुभाष मीणा को मानसिक रूप से तोड़ दिया।
आरोप से शुरू हुई परेशानियों की कहानी
सुभाष मीणा, जो मूल रूप से धौलाना तहसील में तैनात थे, पर 4 जून को गांव के एक व्यक्ति भूपेंद्र ने रिश्वत मांगने का आरोप लगाया था। भूपेंद्र ने जनचौपाल के दौरान बताया कि सुभाष ने खसरा-खतौनी की नकल दिलवाने के बदले अपने सहायक के ज़रिए ₹500 की मांग की थी। इस शिकायत को गंभीरता से लेते हुए जिलाधिकारी ने 5 जून को सुभाष को निलंबित कर दिया, साथ ही मामले की जांच भी शुरू कर दी गई।
तनाव और सामाजिक दबाव में टूट गए सुभाष
परिजनों का कहना है कि निलंबन के बाद सुभाष काफी तनाव में रहने लगे थे। सामाजिक अपमान और मानसिक दबाव ने उन्हें अवसाद की ओर धकेल दिया। बुधवार को उन्होंने तहसील परिसर में ही जहरीला पदार्थ खाकर जान देने की कोशिश की, लेकिन अस्पताल में भर्ती कराने के बावजूद उनकी जान नहीं बचाई जा सकी। फिलहाल शव का पोस्टमार्टम कराया जा रहा है, जिसकी रिपोर्ट का इंतजार है।
लेखपाल संघ का आरोप
लेखपाल संघ ने जिला प्रशासन पर नाराजगी जताते हुए कहा कि सिर्फ एक शिकायत पर बिना ठोस जांच के सस्पेंशन जैसे कठोर फैसले लेना कर्मचारी के साथ अन्याय है। संघ ने मृतक के परिवार को मुआवजा और एक आश्रित को सरकारी नौकरी देने की मांग भी की है।
मुख्यमंत्री का सख्त संदेश
CM योगी आदित्यनाथ ने इस मामले को गंभीरता से लेते हुए मेरठ मंडल के आयुक्त और पुलिस महानिरीक्षक को संयुक्त जांच के निर्देश दिए हैं। उन्होंने कहा, भ्रष्टाचार बर्दाश्त नहीं किया जाएगा, लेकिन किसी कर्मचारी के साथ अन्याय भी नहीं होना चाहिए। यह बेहद दुर्भाग्यपूर्ण घटना है।
मुख्यमंत्री ने आगे कहा कि ऐसी घटनाओं से बचने के लिए पारदर्शी और मानवीय जांच प्रणाली विकसित की जाए और अधिकारियों को निर्देश दिया कि कर्मचारियों को अनावश्यक मानसिक पीड़ा से बचाने के उपाय किए जाएं।
डीएम कार्यालय की ओर से भरोसा दिलाया गया है कि जांच पूरी तरह निष्पक्ष और पारदर्शी होगी। लेकिन इस घटना ने एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है क्या केवल एक शिकायत पर की गई कठोर कार्रवाई किसी निर्दोष को आत्मघात की ओर तो नहीं धकेल रही?
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