बलरामपुर लैंड स्कैम रोकने में प्रशासन फेल! सरकारी जमीनों पर तेजी से हो रहा अवैध निर्माण
Sandesh Wahak Digital Desk: उत्तर प्रदेश में योगी सरकार का नारा है “भू-माफियाओं का काल, सरकारी जमीन पर बुलडोजर बेमिसाल।” लेकिन बलरामपुर जिले की उतरौला तहसील से जो जमीनी हकीकत सामने आ रही है, वह दावों के उलट प्रशासनिक तंत्र की विफलता और रसूखदारों के दुस्साहस की एक सनसनीखेज दास्तां बयां करती है। यहां नगर कस्बे के प्राइम लोकेशन पर स्थित तालाब, रास्ते और बंजर भूमि जैसी सार्वजनिक संपत्तियों को न केवल कागजों में ‘कलम’ के खेल से निजी बनाया गया, बल्कि हाईकोर्ट के आदेशों को धता बताकर वहां एक अवैध ‘शिक्षा का मंदिर’ भी खड़ा कर दिया गया।

कागजों में जालसाजी: अलग स्याही और फर्जी हस्तलेख का खेल
इस पूरे प्रकरण की परतें जब खुलनी शुरू हुईं, तो राजस्व विभाग के भीतर चल रहे भ्रष्टाचार का काला चेहरा सामने आ गया। उपजिलाधिकारी (एसडीएम) उतरौला के जून 2022 के एक आदेश के मुताबिक, गाटा संख्या 5287, 5288, 5291 और 5329 जो सरकारी रिकॉर्ड में बंजर, परती जदीद, तालाब और रास्ते के रूप में दर्ज थे उनमें रातों-रात निजी व्यक्तियों के नाम दर्ज कर दिए गए।
जांच में यह चौंकाने वाला तथ्य सामने आया कि सन् 1362 फसली की खतौनी में ‘रास्ता’ की जमीन पर एक व्यक्ति का नाम दर्ज करने के लिए अलग हस्तलेख (Handwriting) और अलग स्याही का इस्तेमाल किया गया था। अदालत ने इसे स्पष्ट रूप से ‘फर्जी प्रविष्टि’ करार दिया। यह साफ है कि बिना राजस्व विभाग के कर्मचारियों की मिलीभगत के सरकारी रिकॉर्ड में इतनी बड़ी सेंधमारी मुमकिन नहीं थी।

हाईकोर्ट का कड़ा रुख और प्रशासनिक सुस्ती
जब इस भ्रष्टाचार की गूंज इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच तक पहुंची, तो वादी विश्वास कुमार पांडेय की जनहित याचिका पर न्यायालय ने सख्त रुख अपनाया। हाईकोर्ट ने जिला प्रशासन को तीन महीने के भीतर इन फर्जी नामों को निरस्त कर जमीन को दोबारा सरकारी घोषित करने और अवैध कब्जा हटाने के स्पष्ट निर्देश दिए थे।
कोर्ट के आदेश के क्रम में तहसीलदार और उपजिलाधिकारी की अदालतों ने इन फर्जी इंदराजों को निरस्त भी कर दिया और जमीन को वापस उसके मूल स्वरूप (तालाब और रास्ता) में दर्ज करने का फैसला सुनाया। इसके साथ ही अवैध कब्जा करने वालों पर ₹5,98,500 का भारी-भरकम हर्जाना भी लगाया गया। लेकिन आदेश के महीनों बाद भी धरातल पर बुलडोजर तो दूर, एक ईंट तक नहीं हिली।
यथास्थिति के आदेश के बीच जारी है अवैध निर्माण
वर्तमान में मामला राजस्व परिषद (Board of Revenue) में विचाराधीन है। जनवरी 2026 में राजस्व परिषद ने इस विवादित स्थल पर ‘यथास्थिति’ (Status Quo) बनाए रखने और शांति व्यवस्था का निर्देश दिया था। लेकिन स्थानीय निवासियों और प्राप्त तस्वीरों के अनुसार, कानून के इन आदेशों की सरेआम धज्जियां उड़ाई जा रही हैं।

विवादित जमीन पर ‘पब्लिक मॉडर्न आइडियल स्कूल’ जैसी इमारतें पूरी तेजी से बनकर खड़ी हो रही हैं। हैरानी की बात यह है कि जिस जमीन को प्रशासन ने सरकारी घोषित कर दिया है, वहां पक्के निर्माण के लिए बिजली कनेक्शन और अन्य सुविधाएं कैसे मिल रही हैं? क्या जिला प्रशासन और विभाग के जिम्मेदार अधिकारी जानबूझकर अपनी आंखें मूंदे हुए हैं?
अधिकारियों के जवाब: हमें तो पता ही नहीं!
जब इस मामले की गंभीरता को लेकर उतरौला के उप-जिलाधिकारी (एसडीएम) अभय कुमार सिंह से बात की गई, तो उनका जवाब किसी को भी हैरान कर सकता है। उन्होंने कहा कि मामला उनके संज्ञान में नहीं है और वे इसकी जांच कराएंगे। उन्होंने यहाँ तक कह दिया कि “आप आदेश की प्रतियां मुझे व्हाट्सएप कर दीजिए।”
वहीं, क्षेत्र के लेखपाल विद्या दत्त का कहना था कि वे निर्माण रोकने गए थे और काम रुक भी गया था। लेकिन जब उनसे पूछा गया कि अगर निर्माण अभी भी चल रहा है तो क्या कार्रवाई होगी, तो उन्होंने गेंद उच्च अधिकारियों के पाले में डाल दी। इन बयानों से ऐसा प्रतीत होता है कि तहसील प्रशासन या तो पूरी तरह ‘बेखबर’ होने का नाटक कर रहा है या फिर रसूखदारों के दबाव में नतमस्तक है।
जनता का सवाल: कब चलेगा योगी का बुलडोजर?
वादी विश्वास कुमार पांडेय का आरोप है कि रसूखदार लोग कानून की पेचीदगियों का सहारा लेकर केवल समय काट रहे हैं ताकि निर्माण कार्य पूरा कर जमीन के स्वरूप को हमेशा के लिए बदल सकें। तालाब और रास्तों पर हुए इस कब्जे से स्थानीय पर्यावरण और जन-सुविधाओं पर भारी असर पड़ रहा है।
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने सदन में कई बार दोहराया है कि सरकारी जमीनों पर अवैध कब्जा करने वालों के खिलाफ ‘जीरो टॉलरेंस’ की नीति अपनाई जाएगी। अब बलरामपुर की जनता यह देख रही है कि क्या प्रशासन मुख्यमंत्री के संकल्पों और हाईकोर्ट के आदेशों का सम्मान करते हुए इस अवैध साम्राज्य को ढहाएगा, या फिर फाइलों के फेर में न्याय की बलि चढ़ती रहेगी।
रिपोर्ट: योगेंद्र त्रिपाठी
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