नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम का पूरा जीवन इबादत और बन्दगी का नमूना: मौलाना याह्या नोमानी
Lucknow News: नोमानी इंस्टीट्यूट फॉर बॉयज़ के तत्वावधान में आयोजित 12-दिवसीय “सीरत-उन-नबी ऑनलाइन व्याख्यान श्रृंखला” में प्रसिद्ध विद्वान मौलाना याह्या नोमानी नदवी ने “रसूल अल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की इबादत और अब्दियत” विषय पर एक व्यापक और आस्था को प्रेरित करने वाला व्याख्यान दिया। उन्होंने बताया कि इस्लाम की सबसे बुनियादी दावत तौहीद है, यानि अल्लाह की इबादत करना और किसी को उसका शरीक न ठहराना। यही दावत सभी नबियों का साझा संदेश रही है। नबियों की तालीम स्वयं अल्लाह की ओर से होती है।
मौलाना नोमानी ने बताया कि नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम के जीवन में नमाज़ का बहुत महत्व था। आपके लिए नमाज़ सुकून का सबसे बड़ा साधन थी। जब भी कोई परेशानी आती, आप नमाज़ में मशगूल हो जाते। आपने फरमाया: “मेरे दिल की ठंडक नमाज़ में है।” नमाज़ रूह की खुराक है। उन्होंने एक घटना का ज़िक्र किया कि एक युद्ध के दौरान जब अस्र की नमाज़ क़ज़ा (छूट) हो गई, तो नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने दुश्मनों के लिए बद्दुआ की, जो आपके जीवन का पहला और आखिरी मौका था। इससे नमाज़ की अहमियत और उसके मकाम का साफ अंदाज़ा होता है। इस संदर्भ में, उन्होंने कहा कि जिस दीन में नमाज़ नहीं, उसमें कोई भलाई नहीं।
हज़रत आयशा रज़ियल्लाहु अन्हा की रिवायत का हवाला देते हुए मौलाना याह्या नदवी ने बताया कि नबी सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम अक्सर रात का दो-तिहाई हिस्सा इबादत में बिताते थे। आप फरमाते थे, क्या मैं अल्लाह का शुक्रगुज़ार बन्दा न बनूं? आप सजदे की हालत में बहुत ज़्यादा दुआ मांगते थे, क्योंकि बन्दा इस हालत में अल्लाह के सबसे ज़्यादा क़रीब होता है।
हज़रत आयशा रज़ियल्लाहु अन्हा के एक अन्य बयान के अनुसार, एक रात जब उन्होंने आपको बिस्तर पर न पाया, तो तलाश करने पर उनका हाथ आपके पांव के तलवों पर पड़ा, जिससे पता चला कि आप सजदे में रोते हुए दुआ कर रहे थे। इससे यह भी साबित होता है कि अल्लाह के रसूल बहुत ज़्यादा इस्तिग़फ़ार करते थे, हालांकि आपसे कभी कोई गुनाह नहीं हुआ था।
मौलाना याह्या नोमानी नदवी ने स्पष्ट किया कि आपकी इबादत केवल बाहरी अमल तक सीमित नहीं थी, बल्कि आपका पूरा जीवन बन्दगी का नमूना था। आप तहज्जुद पढ़ते, बहुत ज़्यादा रोज़े रखते और सदक़ा व खैरात करते। आपके पास जो भी माल आता, रात होने से पहले उसे ज़रूरतमंदों में बांट देते थे। आपके जीवन का सबसे लज़ीज़ शगल दुआ थी। इसलिए हमें भी आपकी दुआएं याद करनी चाहिए।
व्याख्यान के अंत में मौलाना याह्या नोमानी नदवी ने ज़ोर देकर कहा कि रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम ने कभी अपनी ज़ात के लिए किसी से बदला नहीं लिया और न ही कभी नाराज़ हुए। उन्होंने बताया कि भीतरी बन्दगी इबादत से आती है। दीन के रास्ते में मुश्किलों पर क़ाबू पाने की ताक़त और दीन के रास्ते की शक्ति अल्लाह तआला क़ियाम-उल-लैल (रात की नमाज़) से प्रदान करता है। आपका पूरा जीवन उच्च नैतिकता, दया, इबादत, मुनाजात और ज़िक्र व अज़कार से भरा हुआ था। नबी करीम सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम की सीरत हमें यह सबक देती है कि एक मोमिन का जीवन हर पल अल्लाह की बन्दगी में कैसे गुज़रता है।
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