‘सरकार की चुप्पी खलती है’, खामेनेई की मौत पर Sonia Gandhi ने उठाए सवाल

Sandesh Wahak Digital Desk: बीते 28 फरवरी को अमेरिका और इजराइल ने साझा सैन्य ऑपरेशन के तहत ईरान पर हमला किया और 1 मार्च को ईरान ने पुष्टि की कि उसके सुप्रीम लीडर अयातुल्ला सैयद अली हुसैनी खामेनेई की एक दिन पहले टारगेटेड स्ट्राइक में हत्या कर दी गई। इस हमले के बाद मध्य पूर्व में हालात बेहद तनावपूर्ण हो गए हैं और दोनों ओर से संघर्ष तेज हो गया है। क्षेत्र में जारी टकराव ने अंतरराष्ट्रीय राजनीति को भी झकझोर दिया है। इसी घटनाक्रम के बीच कांग्रेस की पूर्व अध्यक्ष सोनिया गांधी (Sonia Gandhi) ने भारत सरकार की चुप्पी पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं।

दिल्ली की चुप्पी पर सवाल

एक अंग्रेजी अखबार में लिखे अपने लेख की शुरुआत में सोनिया गांधी (Sonia Gandhi) ने कहा कि दोनों पक्षों के बीच बातचीत चल रही थी, ऐसे समय में किसी मौजूदा राष्ट्राध्यक्ष की हत्या अंतरराष्ट्रीय संबंधों में एक बड़ी दरार को दिखाती है। उन्होंने कहा कि इस घटना के सदमे के साथ-साथ जो बात साफ तौर पर सामने आती है, वह है नई दिल्ली की चुप्पी। उनके मुताबिक भारत सरकार ने न तो हत्या की निंदा की और न ही ईरानी संप्रभुता के उल्लंघन पर कोई स्पष्ट रुख लिया।

सोनिया गांधी (Sonia Gandhi) ने लिखा कि शुरू में प्रधानमंत्री ने अमेरिकी-इजराइली हमले का उल्लेख किए बिना खुद को केवल यूएई पर ईरान के जवाबी हमले की निंदा तक सीमित रखा। बाद में गहरी चिंता जताई गई और बातचीत व कूटनीति का जिक्र किया गया, जबकि उनके अनुसार अमेरिका और इजराइल की ओर से बिना किसी उकसावे के बड़े हमले पहले ही हो चुके थे। उन्होंने कहा कि जब किसी विदेशी नेता की टारगेटेड किलिंग के बाद भारत की ओर से संप्रभुता या अंतरराष्ट्रीय कानून का जिक्र नहीं होता, तो इससे देश की विदेश नीति की दिशा और उसकी विश्वसनीयता पर गंभीर सवाल उठते हैं।

टाइमिंग और इजराइल दौरे पर उठे सवाल

अपने लेख में सोनिया गांधी (Sonia Gandhi) ने United Nations चार्टर के अनुच्छेद 2(4) का उल्लेख करते हुए कहा कि यह किसी भी देश की क्षेत्रीय संप्रभुता या राजनीतिक स्वतंत्रता के खिलाफ ताकत के इस्तेमाल पर रोक लगाता है। उनके मुताबिक किसी मौजूदा राष्ट्राध्यक्ष की टारगेटेड किलिंग इन सिद्धांतों के विपरीत है। उन्होंने कहा कि अगर दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र से ऐसे कदमों पर सैद्धांतिक आपत्ति भी दर्ज नहीं की जाती, तो अंतरराष्ट्रीय मानकों का क्षरण सामान्य हो जाता है।

इस लेख में सोनिया गांधी (Sonia Gandhi) ने हमले की टाइमिंग पर भी सवाल उठाए हैं। उन्होंने कहा कि खामेनेई की मौत से लगभग 48 घंटे पहले प्रधानमंत्री इजराइल के दौरे से लौटे थे, जहां उन्होंने प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की सरकार के समर्थन की बात दोहराई थी। उन्होंने गाजा में जारी संघर्ष और आम नागरिकों की मौतों का जिक्र करते हुए कहा कि ऐसे समय में भारत का हाई-प्रोफाइल राजनीतिक समर्थन एक परेशान करने वाला बदलाव दर्शाता है, खासकर तब जब ग्लोबल साउथ के कई देश और BRICS के साझेदार रूस और चीन दूरी बनाए हुए हैं।

कांग्रेस का रुख और संविधान का हवाला

सोनिया गांधी (Sonia Gandhi) ने कहा कि कांग्रेस ने ईरान की जमीन पर हुए बम धमाकों और टारगेटेड किलिंग की खुलकर निंदा की है और इसे खतरनाक बढ़ोतरी बताया है जिसके क्षेत्रीय और वैश्विक स्तर पर गंभीर परिणाम हो सकते हैं। उन्होंने कहा कि भारत की विदेश नीति विवादों के शांतिपूर्ण समाधान पर आधारित है, जैसा कि संविधान की धारा 51 में उल्लेखित है। यह सिद्धांत संप्रभुता की समानता, आंतरिक मामलों में दखल न देने और शांति को बढ़ावा देने पर आधारित है, जो ऐतिहासिक रूप से भारत की कूटनीतिक पहचान का हिस्सा रहे हैं।

सोनिया गांधी (Sonia Gandhi) ने भारत और ईरान के सिविलाइजेशनल और रणनीतिक संबंधों का भी जिक्र किया। उन्होंने बताया कि 1994 में जब Organisation of Islamic Cooperation ने कश्मीर मुद्दे पर भारत के खिलाफ प्रस्ताव लाने की कोशिश की थी, तब तेहरान ने उसे रोकने में अहम भूमिका निभाई थी। उन्होंने यह भी कहा कि ईरान ने पाकिस्तान सीमा के पास ज़ाहेदान में भारत की कूटनीतिक मौजूदगी को संभव बनाया, जो ग्वादर बंदरगाह और चीन-पाकिस्तान इकॉनमिक कॉरिडोर के संदर्भ में एक रणनीतिक संतुलन का काम करता है।

उन्होंने अप्रैल 2001 में तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के तेहरान दौरे का उल्लेख करते हुए कहा कि उस समय भारत और ईरान के गहरे ऐतिहासिक संबंधों की पुष्टि की गई थी। उनके मुताबिक मौजूदा सरकार को उन रिश्तों को भी याद रखना चाहिए।

ग्लोबल साउथ और नैतिक नेतृत्व का सवाल

सोनिया गांधी (Sonia Gandhi) ने कहा कि करीब एक करोड़ भारतीय खाड़ी देशों में रहते और काम करते हैं। खाड़ी युद्ध से लेकर यमन, इराक और सीरिया तक के संकटों में भारत की विश्वसनीयता इस बात पर टिकी रही कि उसने खुद को किसी प्रॉक्सी के रूप में पेश नहीं किया। उन्होंने याद दिलाया कि आजादी के बाद भारत की विदेश नीति गुटनिरपेक्षता के सिद्धांत पर आधारित रही, जो पैसिव न्यूट्रैलिटी नहीं बल्कि रणनीतिक स्वायत्तता का दावा था। उनके अनुसार ताकतवर देशों की एकतरफा सैन्य कार्रवाई के सामने चुप्पी उसी सिद्धांत से पीछे हटने जैसी प्रतीत होती है।

सोनिया गांधी (Sonia Gandhi) ने लिखा कि अगर संप्रभुता को बिना किसी परिणाम के नजरअंदाज किया जा सकता है, तो छोटी ताकतों को बड़ी शक्तियों की मनमानी के सामने छोड़ दिया जाता है। उन्होंने कहा कि भारत ने नियमों पर आधारित अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था की वकालत की है, ऐसे में जरूरत के समय उस सिद्धांत का समर्थन न करना खोखला लगता है। उनके अनुसार जो देश ग्लोबल साउथ का नेतृत्व करना चाहता है, उसे नैतिक स्पष्टता और रणनीतिक दृढ़ता दोनों दिखानी चाहिए।

संसद में बहस और रणनीतिक स्पष्टता की मांग

अपने लेख के अंत में सोनिया गांधी (Sonia Gandhi) ने कहा कि यदि मतभेद हैं तो संसद उचित मंच है जहां इस मुद्दे पर खुली बहस होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि किसी विदेशी राष्ट्राध्यक्ष की टारगेटेड किलिंग, अंतरराष्ट्रीय मानकों का क्षरण और पश्चिम एशिया में बढ़ती अस्थिरता सीधे भारत के कूटनीतिक हितों और नैतिक प्रतिबद्धताओं को प्रभावित करती है। वसुधैव कुटुम्बकम की भावना का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि यह केवल नारा नहीं बल्कि न्याय, संयम और संवाद के प्रति प्रतिबद्धता है। उनके मुताबिक ऐसे समय में चुप्पी छोड़कर स्पष्ट और प्रतिबद्ध रुख अपनाना ही भारत की नैतिक ताकत को पुनर्स्थापित कर सकता है।

 

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