The Raja Saab Review: लौट आया प्रभास का लाइट मोड!
Sandesh Wahak Digital Desk: तेलुगू सिनेमा के रेबल स्टार प्रभास की बहुप्रतीक्षित फिल्म ‘द राजा साब’ (The Raja Saab) आखिरकार रिलीज हो चुकी है। लंबे समय बाद दर्शकों को प्रभास का वो अंदाज देखने को मिल रहा है, जिसे कभी उनके फैंस प्यार से ‘डार्लिंग’ कहा करते थे। ‘बाहुबली’ के बाद प्रभास लगातार ऐसे किरदारों में नजर आए, जहां या तो तलवार उठानी थी या फिर दुनिया बचानी थी। ऐसे में ‘द राजा साब’ में उनका हल्का-फुल्का, मुस्कुराता हुआ अंदाज एक सरप्राइज की तरह सामने आता है। साउथ के फैंस लंबे समय से अपने डार्लिंग को इसी रूप में देखने की मांग कर रहे थे। लेकिन सवाल यह है कि क्या ये फिल्म सच में पैसे वसूल अनुभव देती है या फिर सिर्फ प्रभास के नाम पर थिएटर तक खींच लाती है।
कहां से होती है कहानी की शुरुआत?
फिल्म (The Raja Saab) की कहानी राजा यानी प्रभास से शुरू होती है, जो अपनी दादी गंगम्मा के साथ एक शांत जीवन जी रहे हैं। दादी अल्जाइमर की मरीज हैं, उन्हें बहुत कुछ भूल जाता है, लेकिन जो बात उन्हें सबसे ज्यादा याद रहती है, वो है उनके खोए हुए पति कनक राजू का चेहरा। दादी को सपनों में बार-बार अपने पति दिखाई देते हैं और उन्हीं सपनों के सहारे वो राजा को आदेश देती हैं कि वह अपने दादाजी को ढूंढ़ कर लाए। दादी की इस इच्छा को पूरा करने के लिए राजा झोला उठाकर हैदराबाद की गलियों में निकल पड़ता है।
तलाश करते-करते राजा एक ऐसे सुराग तक पहुंचता है, जो उसे एक पुराने और भुतहा महल के दरवाजे पर खड़ा कर देता है। यही महल उसके गायब दादा कनक राजू का है। इसके बाद कहानी भूतिया मोड़ लेती है। महल का अतीत क्या है, दादी को सपने क्यों आते हैं और क्या राजा अपने दादाजी से मिल पाएगा, इन सवालों के जवाब फिल्म के साथ आगे खुलते हैं।

The Raja Saab का टोन और रफ्तार
प्रभास के फैंस के लिए यह फिल्म (The Raja Saab) एक तरह से ट्रीट है क्योंकि पूरे समय उनका रिफ्रेशिंग अंदाज देखने को मिलता है। लेकिन फिल्म की सबसे बड़ी समस्या इसकी लंबाई है। करीब तीन घंटे की इस फिल्म को मेकर्स ने जरूरत से ज्यादा खींच दिया है। कई जगह कहानी की रफ्तार इतनी धीमी हो जाती है कि भूत से ज्यादा घड़ी की सुइयां डराने लगती हैं। अगर आपके पास खूब समय है और आप साउथ की मसाला फिल्मों के शौकीन हैं, तो यह फिल्म आपके लिए ठीक-ठाक साबित हो सकती है, लेकिन एक बेहतर निर्देशन इसे कहीं ज्यादा मजेदार बना सकता था।
निर्देशन में कहां भटका विजन?
फिल्म का निर्देशन मारुति ने किया है। उनके पास एक शानदार मौका था कि वह प्रभास के पुराने ‘डार्लिंग’ चार्म को एक दमदार हॉरर-कॉमेडी में ढालते। कहानी का आइडिया कागज पर अच्छा लगता है, लेकिन परदे पर आते-आते उनका विजन थोड़ा भटक जाता है। फिल्म में झाड़-फूंक, हिप्नोटिज्म, तंत्र-मंत्र और सुपरनैचुरल ताकतों का ऐसा मेल है कि अंत तक यह तय करना मुश्किल हो जाता है कि फिल्म डराना चाहती है, हंसाना चाहती है या सिर्फ कन्फ्यूज करना चाहती है।
हालांकि तकनीकी पक्ष पर निर्देशक की मेहनत साफ दिखती है। फिल्म के रंग, भुतहा महल का सेट और प्रभास की एंट्री सब कुछ इतना भव्य है कि कुछ देर के लिए आप कहानी की कमजोरियों को भूलकर स्क्रीन पर खो सकते हैं। अगर आप लॉजिक से ज्यादा मास-एंटरटेनर फिल्मों के शौकीन हैं, तो शायद आपको यह अनुभव पसंद आ जाए।
एक्टिंग में किसने संभाली फिल्म?
परफॉर्मेंस की बात करें तो प्रभास एक नेकदिल और हंसी-मजाक करने वाले किरदार में नजर आते हैं और उन्हें इस अवतार में देखना किसी ट्रीट से कम नहीं है। संजय दत्त और जरीना वहाब ने भी अपनी भूमिकाओं को मजबूती से निभाया है और इन तीनों के कंधों पर फिल्म काफी हद तक टिकी हुई है। फिल्म में तीन हीरोइनें हैं, लेकिन उनकी मौजूदगी कहानी को आगे बढ़ाने के बजाय सिर्फ ग्लैमर का तड़का बनकर रह जाती है, जिससे दर्शक ज्यादा कनेक्ट नहीं कर पाते।
फिल्म (The Raja Saab) में कुछ ऐसे पल जरूर आते हैं, जहां लगता है कि निर्देशक ने कमाल कर दिया है। खास तौर पर हिप्नोटिज्म से जुड़े सीन उम्मीद जगाते हैं कि अब कुछ अलग और दमदार देखने को मिलेगा। हॉस्पिटल वाला सीन, जहां राजा और कनक राजू की जुगलबंदी दिखाई देती है, फिल्म के बेहतर पलों में से एक है। प्रभास की कॉमिक टाइमिंग भी काफी शानदार है और उन्हें इस तरह के किरदार और करने चाहिए। लेकिन दिक्कत यह है कि फिल्म इन अच्छे मौकों को बस छूकर आगे बढ़ जाती है और उन्हें पूरी तरह भुना नहीं पाती।
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