‘यह वकालत नहीं, गुंडागर्दी है’, यूपी के वकीलों पर सुप्रीम कोर्ट का गुस्सा, बाराबंकी टोल केस दिल्ली ट्रांसफर

Sandesh Wahak Digital Desk: देश की सर्वोच्च अदालत ने बाराबंकी में वकीलों द्वारा की गई हिंसा, तोड़फोड़ और आगजनी की घटना पर तल्ख टिप्पणी की है। जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने साफ कहा कि वकीलों का ऐसा व्यवहार कानूनी पेशे की प्रतिष्ठा को कलंकित करता है। अदालत ने इसे ‘खुलेआम हूलिगनिज्म’ (गुंडागर्दी) करार दिया।

क्या था पूरा विवाद?

मामले की शुरुआत 14 जनवरी 2026 को हुई, जब एक वकील रत्नेश शुक्ला और टोल कर्मचारियों के बीच टोल टैक्स देने को लेकर बहस हुई। विवाद बढ़ा और मारपीट तक पहुंच गया। इसके बाद बाराबंकी बार एसोसिएशन ने एक विवादास्पद प्रस्ताव पारित कर दिया कि कोई भी स्थानीय वकील टोल कर्मचारियों का केस नहीं लड़ेगा।

सहकर्मी के दफ्तर में आगजनी पर नाराजगी

विवाद तब और गहरा गया जब वकील मनोज शुक्ला ने बार के प्रस्ताव का विरोध करते हुए टोल कर्मचारियों की जमानत याचिका दायर की। आरोप है कि इससे नाराज साथी वकीलों ने मनोज शुक्ला के चैम्बर में घुसकर तोड़फोड़ की, फर्नीचर जलाया और उनका पुतला फूंका। सुप्रीम कोर्ट ने मनोज शुक्ला की सराहना करते हुए उन्हें ‘बहादुर वकील’ बताया, जिन्होंने भारी दबाव और हिंसा के बावजूद अपने पेशेवर धर्म का पालन किया।

UP बार काउंसिल को भी फटकार

सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश बार काउंसिल के रवैये पर भी हैरानी जताई। अदालत ने कहा कि यह बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है कि बार काउंसिल ने एक छोटी सी झड़प के मामले में राज्य सरकार से NSA (रासुका) लगाने जैसी अनुचित मांग कर डाली। कोर्ट ने उम्मीद जताई कि बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) इस पूरी घटना और इसमें शामिल वकीलों पर सख्त अनुशासनात्मक कार्रवाई करेगा।

कोर्ट के तीन बड़े फैसले

  • हिंसा के माहौल और स्थानीय स्तर पर वकीलों द्वारा केस न लड़ने के कारण, सुप्रीम कोर्ट ने पूरी न्यायिक कार्यवाही को उत्तर प्रदेश से हटाकर दिल्ली ट्रांसफर कर दिया है।
  • कोर्ट ने सभी टोल कर्मचारियों को जमानत दे दी है। साथ ही यूपी के डीजीपी को आदेश दिया कि वे इन कर्मचारियों की सुरक्षा सुनिश्चित करें और उन्हें सुरक्षित स्थान तक पहुंचाएं।
  • अदालत ने कहा कि जब कोई वकील पक्ष लेने को तैयार न हो, तो यह आरोपी के कानूनी अधिकारों का हनन है।

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