‘तीन बच्चे पैदा करने चाहिए’, मोहन भागवत बोले- भारत को समझने के लिए जरूरी है संस्कृत का अध्ययन
Sandesh Wahak Digital Desk: राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के प्रमुख मोहन भागवत ने कहा कि भारत की परंपरा और ज्ञान को समझने के लिए संस्कृत का बुनियादी ज्ञान बेहद जरूरी है। उन्होंने स्पष्ट किया कि इसे अनिवार्य बनाना सही नहीं होगा, लेकिन संस्कृत के प्रति उत्सुकता जगानी होगी और इसे शिक्षा की मुख्यधारा से जोड़ना चाहिए।
जनसंख्या पर बयान
आरएसएस प्रमुख ने देश की जनसंख्या नीति का हवाला देते हुए कहा कि हर परिवार में तीन बच्चों का होना उचित है। भागवत ने कहा भारत की जनसंख्या नीति 2.1 बच्चों की बात करती है, जिसका अर्थ है कि प्रति परिवार कम से कम तीन बच्चे होने चाहिए। तीन बच्चों से माता-पिता और बच्चों का स्वास्थ्य भी ठीक रहता है और देश के नजरिए से यह संख्या पर्याप्त है। उन्होंने आगे कहा कि नागरिकों को इस दिशा में सोचने की जरूरत है, ताकि जनसंख्या नियंत्रित भी रहे और देश की आवश्यकताओं के अनुरूप पर्याप्त भी।
‘अखंड भारत’ पर विचार
भागवत ने बताया कि विभाजन से पहले आरएसएस ने इसका विरोध किया था, लेकिन उस समय संगठन की ताकत सीमित थी। उन्होंने कहा कि अखंड भारत केवल राजनीति का मुद्दा नहीं, बल्कि जीवन की सच्चाई है। यह हमारी वास्तविकता को दर्शाता है।
शिक्षा और संस्कृति पर जोर
आरएसएस प्रमुख ने नई शिक्षा नीति का जिक्र करते हुए कहा कि इसमें पंचकोशीय शिक्षा का विचार शामिल है, जिसमें कला, खेल और योग भी शामिल किए गए हैं। उन्होंने कहा कि हर व्यक्ति को कला और संगीत का ज्ञान होना चाहिए। संस्कृत और शिक्षा पर बात करते हुए उन्होंने कहा भारत की सही पहचान को समझने के लिए संस्कृत का अध्ययन आवश्यक है। गुरुकुल प्रणाली को शिक्षा की मुख्यधारा से जोड़ना चाहिए। हालांकि इसे बाध्यकारी नहीं बनाया जाना चाहिए, क्योंकि अनिवार्यता से अक्सर विरोध पैदा होता है।
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