Lucknow News: एडवोकेट और महिला पर SC/ST Act के तहत झूठे मुकदमे दर्ज कराने का आरोप, कोर्ट ने सुनाई सजा
Sandesh Wahak Digital Desk: लखनऊ के एक विशेष न्यायालय में इन दिनों एक ऐसा मामला चल रहा है, जिसने कानूनी पेशे की गरिमा पर सवाल खड़े कर दिए हैं। यह मामला एक वकील, परमानंद गुप्ता, और एक महिला, पूजा रावत से जुड़ा है, जिन पर SC/ST Act और गंभीर अपराधों के तहत झूठे मुकदमे दर्ज कराने का आरोप है। यह केस न सिर्फ कानून के दुरुपयोग को उजागर करता है, बल्कि यह भी दिखाता है कि कैसे कुछ लोग अपने निजी स्वार्थ के लिए न्यायपालिका का गलत इस्तेमाल करते हैं। इस मामले में कोर्ट ने परमानंद गुप्ता को आजीवन कारावास की सजा सुनाई है।
पूरा मामला क्या है?
इस मामले की शुरुआत तब हुई जब एसीपी राधारमण सिंह, जो एक जांच अधिकारी हैं, ने पाया कि पूजा रावत द्वारा दर्ज कराई गई एक FIR (मुकदमा संख्या 40/2025) झूठी थी। इस FIR में पूजा ने अरविंद यादव और अवधेश यादव पर गैंगरेप और SC/ST Act के तहत गंभीर आरोप लगाए थे। पूजा ने यह मुकदमा वकील परमानंद गुप्ता के माध्यम से विशेष मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट (कस्टम) की अदालत में धारा 156(3) दंड प्रक्रिया संहिता के तहत एक आवेदन देकर दर्ज कराया था।
हालांकि, पुलिस जांच में चौंकाने वाले तथ्य सामने आए। जांच में पता चला कि जिस जगह पर घटना होने का दावा किया गया था, वहाँ पूजा कभी रहती ही नहीं थी। बल्कि, उस जमीन और मकान पर अरविंद यादव और उनके परिवार का कब्ज़ा था, और वहाँ निर्माण कार्य चल रहा था। पुलिस ने आस-पास के लोगों से पूछताछ की, जिन्होंने पुष्टि की कि पूजा रावत उस मकान में कभी किरायेदार नहीं रही थी।
इसके अलावा, पूजा रावत और आरोपियों के बीच किसी भी तरह के संवाद का कोई सबूत नहीं मिला। कॉल डिटेल रिकॉर्ड (CDR) से यह भी पता चला कि जिस समय घटना का दावा किया गया था, पूजा की लोकेशन घटनास्थल से काफी दूर थी। इन सभी सबूतों के आधार पर पुलिस ने पाया कि पूरा मामला मनगढ़ंत था और इसे परमानंद गुप्ता ने अपनी पत्नी संगीता गुप्ता के जमीन विवाद को लेकर बनाया था।
वकील ने किया षड्यंत्र का खुलासा
पुलिस जांच में यह भी सामने आया कि यह कोई इकलौता मामला नहीं था। पूजा रावत ने परमानंद गुप्ता के माध्यम से कई और लोगों के खिलाफ इसी तरह के झूठे मुकदमे दर्ज कराए थे। इससे पहले, इसी तारीख (24.07.2024) की घटना के लिए पूजा ने विशेष न्यायालय SC/ST में भी FIR दर्ज कराने की कोशिश की थी, लेकिन वह याचिका खारिज हो गई थी। इसके बाद, उन्होंने आरोपियों की संख्या कम करके विशेष सीजेएम (कस्टम) की अदालत में दूसरी याचिका दायर की और FIR दर्ज कराने में सफलता पाई।
अभियोजन पक्ष का आरोप है कि परमानंद गुप्ता ने अपनी पत्नी के जमीन विवाद को सुलझाने और विरोधियों पर दबाव बनाने के लिए SC/ST Act का दुरुपयोग किया। वे पूजा रावत जैसी अनुसूचित जाति की महिलाओं का इस्तेमाल करते थे और झूठे केस दर्ज कराते थे। आरोप है कि ऐसे केसों के बाद मिलने वाली सरकारी राहत राशि भी दोनों आपस में बांट लेते थे।
हाई कोर्ट ने दिए थे CBI जांच के आदेश
यह मामला इतना गंभीर था कि इलाहाबाद हाई कोर्ट ने भी इसका संज्ञान लिया। एक रिट याचिका (संख्या 179/2025) पर सुनवाई करते हुए माननीय उच्च न्यायालय ने पूजा रावत और परमानंद गुप्ता के खिलाफ CBI जांच के आदेश दिए थे। कोर्ट ने पाया था कि यह एक सुनियोजित रैकेट है, जिसमें बार-बार झूठे मामले दर्ज कराए जा रहे हैं।
इसके अलावा, वकील परमानंद गुप्ता पर माननीय उच्च न्यायालय से जमानत याचिका खारिज होने के आदेश को छिपाकर नई जमानत लेने का भी आरोप लगा। इस गंभीर आचरण पर उच्च न्यायालय ने उनके खिलाफ आपराधिक अवमानना की कार्यवाही भी शुरू की थी।
न्यायालय में क्या हुआ?
विशेष न्यायाधीश विवेकानंद शरण त्रिपाठी की अदालत में सुनवाई के दौरान, शुरुआत में पूजा रावत ने एक प्रार्थना पत्र दिया। उसने कहा कि वह एक गरीब महिला है और परमानंद गुप्ता ने उसे अपने जाल में फंसाया था। उसने यह भी कहा कि परमानंद के दबाव में ही उसने झूठे बयान दिए थे और अब वह सच बताना चाहती है, ताकि निर्दोषों को सजा न मिले। कोर्ट ने उसके इस बयान को देखते हुए उसे क्षमादान दे दिया।
हालांकि, जब पूजा रावत और परमानंद गुप्ता को एक ही दिन कोर्ट में बुलाया गया, तो दोनों के बीच बातचीत हुई और पूजा अपने शुरुआती बयानों से मुकर गई। इस पर अभियोजन पक्ष ने आरोप लगाया कि पूजा ने क्षमादान की शर्तों का उल्लंघन किया है।
बहस और निष्कर्ष
मामले की सुनवाई के दौरान अभियोजन पक्ष और बचाव पक्ष, दोनों ने अपनी-अपनी दलीलें पेश कीं।
- अभियोजन पक्ष की दलीलें: विशेष लोक अभियोजक अरविंद मिश्रा ने कहा कि परमानंद गुप्ता ने आपराधिक षड्यंत्र के माध्यम से एक लोक सेवक (पुलिस) को झूठी सूचना दी। उनका मकसद अरविंद यादव और अवधेश यादव जैसे निर्दोष लोगों को आजीवन कारावास जैसे गंभीर अपराधों में फंसाना था। उन्होंने कहा कि यह एक गंभीर अपराध है और दोनों आरोपियों को कड़ी सजा मिलनी चाहिए।
- बचाव पक्ष की दलीलें: अभियुक्त परमानंद गुप्ता ने खुद का बचाव करते हुए कहा कि वह निर्दोष हैं और उन्होंने केवल एक वकील के रूप में अपना फर्ज़ निभाया। उन्होंने पुलिस पर आरोप लगाया कि उन्होंने विपक्षी पार्टी से पैसे लेकर अंतिम रिपोर्ट लगा दी और उनकी विवेचना त्रुटिपूर्ण थी। उन्होंने यह भी कहा कि CBI जांच में उनके खिलाफ कोई आरोप पत्र नहीं आया है।
- न्यायमित्र की दलीलें: पूजा रावत की ओर से नियुक्त न्यायमित्र रमाशंकर द्विवेदी ने कहा कि पूजा एक गरीब और अनपढ़ महिला है, जिसे परमानंद गुप्ता ने अपने फायदे के लिए इस्तेमाल किया। उन्होंने कहा कि पूजा ने कोर्ट को सच तक पहुंचने में मदद की है, इसलिए उसे क्षमादान दिया जाना चाहिए।
- कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि दोषसिद्ध परमानंद गुप्ता एडवोकेट जैसे अपराधी न्यायालय परिसर में प्रवेश और प्रैक्टिस न कर सके, जिससे न्यायपालिका की शुचिता बनी रहे। इस आशय से सूचना एवं निर्णय की प्रतिलिपि बार काउंसिल ऑफ उत्तर प्रदेश इलाहाबाद को पत्र के साथ प्रेषित की जाए।
- इसके साथ ही अभियुक्त पूजा रावत को दोषमुक्त करते हुए उसकी रिहाई परवाना तत्काल जिला काराकार, लखनऊ में भेजा जाए। साथ ही चेतावनी दी जाती है कि भविष्य में यदि उसके द्वारा एससी/एसटी एक्ट के प्रावधानोंका दुरुपयोग करते हुए परमानंद गुप्ता या अन्य किसी के साथ आपराधिक षड़यंत्र करके रेप/गैंगरेप आदि के फर्जी मुकदमें लिखवाये गये तो उसके विरुद्ध कठोर कार्यवाही सुनिश्चित की जाएगी। उसे आदेशित किया जाता है कि कारागार से रिहा होने के उपरांत अपील होने की अवस्था में अपीलीय न्यायालय में उपसंजात होने हेतु धारा 437ए दं0प्र0सं0 के अनुपालन में मु0 20000 रुपये के दो प्रतिभू व इतनी ही धनराशि का व्यक्तिगत मुचलका अंदर सात दिन दाखिल करें।
दर्ज कराए झूठे मुकदमें
सभी पक्षों की दलीलें सुनने और सबूतों का विश्लेषण करने के बाद, कोर्ट ने अपने निष्कर्ष में कहा कि यह मामला वकील जैसे सम्मानित पेशे में छिपे आपराधिक प्रवृत्ति के लोगों का एक समसामयिक उदाहरण है। कोर्ट ने माना कि परमानंद गुप्ता और पूजा रावत ने मिलकर षड्यंत्र रचा और झूठे मुकदमे दर्ज कराए। कोर्ट ने पाया कि दोनों ने कानून और न्यायपालिका की प्रक्रिया का दुरुपयोग किया है। जिसको लेकर परमानंद गुप्ता को उम्रकैद की सजा सुनाई गई।
इस मामले का नतीजा आने पर यह एक महत्वपूर्ण नजीर बन सकता है। यह दिखाता है कि न्यायपालिका, झूठे केसों और कानूनी प्रक्रियाओं के दुरुपयोग को कितनी गंभीरता से ले रही है।
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