UGC नया नियम: कौन हैं वो 30 सांसद जिनकी सिफारिश पर मचा है देश भर में बवाल? देखें पूरी लिस्ट

Sandesh Wahak Digital Desk: उच्च शिक्षण संस्थानों में एससी/एसटी और ओबीसी छात्रों के लिए ‘इक्विटी कमेटी’ बनाने का जो नया नियम लागू हुआ है, वह किसी सरकारी डेस्क से सीधे नहीं निकला। यह नियम संसद की स्थायी समिति (Standing Committee on Education) की सिफारिशों का नतीजा है। इस समिति के अध्यक्ष कांग्रेस के दिग्गज नेता दिग्विजय सिंह हैं, लेकिन इस फैसले में भाजपा के उन सांसदों की भी बराबर की सहमति है जो खुद सवर्ण समाज से आते हैं।

भाजपा का पलड़ा भारी

यह कोई साधारण कमेटी नहीं है; इसमें संसद के दोनों सदनों (लोकसभा और राज्यसभा) के कुल 30 सदस्य शामिल हैं। ताज्जुब की बात यह है कि इस समिति में सत्ताधारी भाजपा के सदस्यों की संख्या 50% से अधिक है।

भाजपा: 16 सांसद

कांग्रेस: 4 सांसद

सपा: 3 सांसद

अन्य दल (TMC, CPM, DMK, NCP, AAP): 7 सांसद

इन बड़े चेहरों ने दी थी मंजूरी (चौंकाने वाले नाम)

संसद की वेबसाइट के मुताबिक, इस समिति में देश के कई कद्दावर राजनेता शामिल हैं जिन्होंने इस नियम की सिफारिश की।

दिग्विजय सिंह (अध्यक्ष): मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री।

भाजपा के दिग्गज: पूर्व केंद्रीय मंत्री रविशंकर प्रसाद, भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता संबित पात्रा, दिल्ली से सांसद बांसुरी स्वराज, और कलकत्ता हाई कोर्ट के पूर्व जज अभिजित गंगोपाध्याय।

राज्यसभा सदस्य: राजस्थान से घनश्याम तिवाड़ी, बिहार से भीम सिंह, और महिला आयोग की पूर्व अध्यक्ष रेखा शर्मा।

विपक्ष के अन्य नाम: स्वाती मालीवाल (आप), सुनेत्रा पवार (एनसीपी), और बिकास रंजन भट्टाचार्य (सीपीएम)।

विवाद की जड़ क्या है?

यूजीसी ने इस कमेटी की सिफारिश पर ‘इक्विटी कमेटी’ बनाने का आदेश दिया है। इसका काम संस्थानों के भीतर आरक्षित वर्ग के छात्रों और शिक्षकों के साथ होने वाले भेदभाव की शिकायतों का निपटारा एक निश्चित समय सीमा के भीतर करना है। सवर्ण समाज का तर्क है कि इस तरह की विशेष समितियां कैंपस में भेदभाव खत्म करने के बजाय ‘विभाजन’ पैदा करेंगी।

हैरानी की बात यह है कि एक तरफ सवर्ण समाज इस कानून को वापस लेने की मांग कर रहा है, वहीं दूसरी तरफ उनके समाज का प्रतिनिधित्व करने वाले भाजपा और अन्य दलों के सांसद इसी कमेटी में बैठकर इस कानून पर मुहर लगा चुके हैं। अब सवाल यह उठ रहा है कि क्या ये सांसद अपनी ही समिति की सिफारिशों का विरोध करेंगे या अपनी पार्टी लाइन पर कायम रहेंगे?

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