सिस्टम की लापरवाही के गड्ढों में डूबने से टूट रहा मौतों का रिकार्ड

सबसे ज्यादा मासूम बच्चे हो रहे शिकार, खनन माफियाओं से लेकर ईंट-भट्ठा संचालक तक जिम्मेदार

Sandesh Wahak Digital Desk/Manish Srivastava: नोएडा में पानी से भरे गड्ढे में डूबने से इंजीनियर की दर्दनाक मौत ने सिस्टम की असल तस्वीर पेश की है। यह पहला वाक्या नहीं है, प्रदेश भर में रोजाना कई जानें लापरवाही से बने गड्ढों में डूबने से जा रही हैं। खासतौर से मासूम बच्चों की।

जिम्मेदार सरकारी तंत्र इस मामले में नहीं है गंभीर

माओं की कोख सूनी करने का जिम्मेदार सरकारी तंत्र इन गड्ढों को भरने के प्रति तनिक भी गंभीर नहीं है। अधिकांश गड्ढे खनन माफियाओं और ईंट-भठ्ठा मालिकों की देन हैं। काल के गाल में समाते इन मासूमों की असमय मौतें नोएडा प्रकरण की तर्ज पर सुर्खियां नहीं बटोर सकीं, अन्यथा खोखली कार्रवाई का ढिंढोरा शायद यहां भी जरूर पीटा जाता।

एक हफ्ते पहले प्रयागराज के पुरामुफ्ती इलाके में अवैध खनन से बने गड्ढे में डूबकर चार मासूम बच्चों की मौत हो गई। पिछले वर्ष जुलाई में भी प्रयागराज में चार मासूम भाइयों की मेजा के बेदौली में गड्ढे में डूबने से मौत हो गयी थी। ईंट भठ्ठे के लिए मिट्टी निकालने से मौत का गड्ढा बना था। जनवरी 2026 में जहां कुशीनगर में क्रिकेट खेलते समय दो बच्चों की पानी से भरे गड्ढे में डूबने से मौत हो गयी। वहीं पीलीभीत में दो मासूम समेत तीन जानें मौनी अमावस्या पर गड्ढे में डूबने से चली गयी। हादसा शारदा घाट पर चैनलाइजेशन कार्य के समय खोदे गड्ढे से हुआ।

हादसों से सबक कब?

2025 में आगरा में यमुना में नदी की खुदाई से बने गड्ढे में डूबने से छह बहनों की जान चली गयी। हरदोई में टडियांवा के गौराडांडा में मासूम कार्तिक और दुर्गेश खनन से बने गड्ढे में डूबकर मर गए। मई में गोंडा में मिट्टी खुदाई से हुए गड्ढे में तीन बच्चे डूबकर मर गए। लखनऊ में अप्रैल में गोसाईंगंज में गड्ढे में डूबने से दो मासूमों की मौत हो गई। ईंट-भठ्ठे की लापरवाही से गड्ढा बना था। यहां भी कार्रवाई फुस्स ही दिखी। दो वर्ष पहले लखनऊ में अवैध खनन से बने गहरे गड्ढे के चलते दो छात्र डूब गए थे। इसी वर्ष इंदिरानगर में कुकरैल रिवर फ्रंट बनाने को खोदे गड्ढे में डूबने से भी दो मासूमों की मौत हुई थी। तीन वर्ष पहले हरदोई में सडक़ किनारे खेल रहे चार बच्चे गड्ढे में डूबने से मौत के मुंह में समा गए।

जानलेवा गड्ढा गंगा एक्सप्रेसवे के लिए मिटटी की खुदाई से बना था। पिछले वर्ष गोंडा में खनन से बने गड्ढे में डूबने से तीन बच्चों की जान गयी। जुलाई में बस्ती में खनन से हुए गड्ढे ने तीन मासूमों को निगल लिया। अगस्त के दौरान बदायूं में खेत में बने पानी भरे गड्ढे में दो भाइयों समेत तीन डूब गए। सभी शहरों में गड्ढों में डूबने से मौतें तो लगातार तेजी से दर्ज हो रही हैं, बस नजीर पेश करने वाली सख्त कार्रवाई नदारद है।

रिपोर्ट : देश में गड्ढों से सबसे अधिक मौतें यूपी में

पिछले वर्ष जारी केंद्रीय सडक़ परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक यूपी में गड्ढों से होने वाली मौतों की संख्या देश में सबसे अधिक है। पिछले पांच वर्षों (2019 से 2023) में भारत में गड्ढों के कारण 9109 मौतें हुईं। जिनमें से 4792 (52 फीसदी से अधिक) मौतें उत्तर प्रदेश से थीं। सिर्फ 2023 की बात करें तो देश में गड्ढों से हुई कुल 2161 मौतों में से 1,320 (लगभग 61 फीसदी) अकेले उत्तर प्रदेश में दर्ज हुईं हैं। भारत में गड्ढों के कारण औसतन प्रतिदिन पांच मौतें हुईं, अकेले उत्तर प्रदेश में तीन से चार मौतें रोजाना गड्ढों सेे होना सरकारी व्यवस्था के माथे पर कलंक के समान है।

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